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Atharvaveda / 1 / 3 / 4

वि॒द्मा श॒रस्य॑ पि॒तरं॑ च॒न्द्रं श॒तवृ॑ष्ण्यम्। तेना॑ ते त॒न्वे॑३ शं क॑रं पृथि॒व्यां ते॑ नि॒षेच॑नं ब॒हिष्टे॑ अस्तु॒ बालिति॑ ॥ 4॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 1 | Sukta : 3 | Paryay : | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : चन्द्रः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : शान्ति के लिये उपदेश।

पदपाठ : विद्म । श॒रस्य॑ । पि॒तर॑म् । च॒न्द्रम् । श॒तऽवृ॑ष्ण्यम् ।तेन॑ । ते॒ । त॒न्वे । शम् । क॒र॒म् । पृ॒थि॒व्याम् । ते॒ । नि॒ऽसेच॑नम् । ब॒हिः । ते॒ । अ॒स्तु॒ । बाल् । इति॑ ॥

पदार्थ : (शरस्य) शत्रुनाशक (वा बाणधारी) शूर के (पितरम्) रक्षक, पिता (चन्द्रम्) आनन्द देनेवाले, चन्द्रमारूप उपकारी (शतवृष्ण्यम्) सैकड़ों सामर्थ्यवाले [परमेश्वर को] (विद्म) हम जानते हैं। (तेन) उस [ज्ञान] से (ते) तेरे (तन्वे) शरीर के लिये (शम्) नीरोगता (करम्) मैं करूँ और (पृथिव्याम्) पृथिवी पर (ते) तेरा (निसेचनम्) बहुत सेचन [वृद्धि] होवे और (ते) तेरा (बाल्) बैरी (बहिः) बाहिर (अस्तु) होवे, (इति) वस यही ॥४॥"

भावार्थ : (चन्द्र) आनन्द देनेवाला अर्थात् अपनी किरणों से अन्न आदि औषधों को पुष्ट करके प्राणियों को बल देता है। उस चन्द्रमा का भी आह्लादक वह परमेश्वर है, ऐसा ही मनुष्य को आनन्द देनेवाला होना चाहिये ॥४॥

टिप्पणी :४−चन्द्रम्। स्फायितञ्चीत्यादिना, उ० २।१३। इति चदि आह्लादने-रक्। चन्द्रश्चन्दतेः कान्तिकर्मणः निरु० ११।५। आह्लादकं देवं, हिमांशुम्। इन्दुम्। तद्वत् उपकारकम्। अन्यत्−यथा मं० १ ॥