Atharvaveda / 1 / 23 / 1
न॑क्तंजा॒तासि॑ ओषधे॒ रामे॒ कृष्णे॒ असि॑क्नि च। इ॒दं र॑जनि रजय कि॒लासं॑ पलि॒तं च॒ यत् ॥ 1॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 1 | Sukta : 23 | Paryay : | Mantra No : 1
In English:
Seer : atharvaa | Devta : asiknii vanaspatiH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : nakta.mjaataasi oShadhe raame kRRiShNe asikni cha. ida.m rajani rajaya kilaasa.m palita.m cha yat . 1.
Component Words : naktam.ajaataa . asi . oShadhe . raame . kRRiShNe . asikni . cha .idam . rajani . rajaya . kilaasam . palitam . cha . yat .
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : असिक्नी वनस्पतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : महारोग के नाश के लिये उपदेश।
पदपाठ : न॒क्त॒म्ऽजा॒ता । अ॒सि॒ । ओ॒ष॒धे॒ । रामे॑ । कृष्णे॑ । असि॑क्नि । च॒ ।इ॒दम् । र॒ज॒नि॒ । र॒ज॒य॒ । कि॒लास॑म् । प॒लि॒तम् । च॒ । यत् ॥
पदार्थ : (ओषधे) हे उष्णता रखनेहारी, ओषधि तू (नक्तंजाता) रात्रि में उत्पन्न हुई (असि) है, जो तू (रामे) रमण करानेहारी (कृष्णे) चित्त को खींचनेहारी, (च) और (असिक्नि) निर्बन्ध [पूर्ण सारवाली] है। (रजनि) हे उत्तम रंग करनेहारी ! तू (इदम्) यह (यत्) जो (किलासम्) रूप का बिगाड़नेहारा कुष्ठ आदि (च) और (पलितम्) शरीर का श्वेतपन रोग है [उसको] (रजय) रंग दे ॥१॥"
भावार्थ : सद्वैद्य उत्तम परीक्षित औषधों से रोगों की निवृत्ति करें ॥१॥ १−रात में उत्पन्न हुई ओषधि से यह आशय है कि ओषधें, गैंहूँ, जौ, चावल आदि अन्न और कमल आदि रोगनिवर्तक पदार्थ, चन्द्रमा की किरणों से पुष्ट होकर उत्पन्न होते हैं ॥ २−इसी प्रकार मनुष्यों को गर्भाधानक्रिया रात्रि में करनी चाहिये ॥ ३−ओषधि आदि मूर्त्तिमान् पदार्थ पाँच तत्त्वों से बने हैं, तो भी उनके भिन्न-भिन्न आकार और भिन्न-भिन्न गुण हैं, यह मूल संयोग-वियोग क्रिया ईश्वर के अधीन है, वस्तुतः मनुष्य के लिये यह कर्म रात्रि अर्थात् अन्धकार वा अज्ञान में है ॥ ४−प्रलयरूपी रात्रि के पीछे, पहिले अन्न आदि पदार्थ उत्पन्न होते हैं फिर मनुष्य आदि की सृष्टि होती है ॥१॥
टिप्पणी :१−नक्तम्-जाता। नज ह्रियि-क्त। नजते लज्जां प्राप्नोति अस्याम्। यद्वा। नक्क नाशने-क्त। नक्कयति नाशयति प्रकाशम् इति नक्तं रात्रिः। जनी प्रादुर्भावे-क्त। रात्रौ जाता उत्पन्ना। अज्ञातजन्मा। ओषधे। ओषः पाको धीयतेऽस्याम्, ओष+डुधाञ् धारणपोषणयोः−कर्मण्यधिकरणे च। पा० ३।३।९३। इति कि प्रत्ययः। ओषधय ओषद् धयन्तीति वा दोषं धयन्तीति वा−निरु० ९।२७। अस्यार्थः−ओषत् शरीरे दहद् रोगजातं धयन्ति पिबन्ति नाशयन्ति। ओषति दाहके ज्वरादौ एना धयन्ति पिबन्ति रोगिणो दाहोपशमनाय। पक्षद्वये, ओषत्+धेट्, पाने-कि। अथवा दोषं वातपित्तादिकं धयन्तीति वा। दोष+धेट्-कि। पृषोदरादित्वाद् दलोपः। हे रोगनाशकद्रव्य ! रामे। रमु क्रीडायाम् णिच् वा-घञ्। टाप्। रमते रमयति वेति रामा, हे रमणशीले, रमणकारिणि, सुखप्रदे। कृष्णे, कृषेर्वर्णे। उ० ३।४। इति बाहुलकाद् वर्णं विनापि। कृष आकर्षणे−नक्। टाप्। कर्षति आनन्दयति चित्तानि स्वमनोहरगुणेन। यद्वा, कर्षति वशीकरोति रोगान् सा कृष्णा। हे आकर्षणशीले। असिक्ना। अञ्चिघृसिभ्यः क्तः। उ० ३।८९। इति षिञ् बन्धने-क्त। अथवा। षो अन्तकर्मणि-क्त नञ्समासः। छन्दसि क्नमित्येके। वार्तिकम्, पा० ४।१।३९। इति असित−टाप्, तकारस्य क्नः। असिता असिक्ना। हे अबद्धशक्ते, अखण्डवीर्ये, पूर्णसारयुक्ते। रजनि। रञ्जेः क्युन्। उ० २।७९। इति रञ्ज खगे-क्युन्, स्त्रियां ङीप्। रञ्जयतीति रजनी। हे सुरञ्जनशीले ! रजय। रञ्ज रागे, नकारलोपः रञ्जय, स्वाभाविकरागयुक्तं कुरु। किलासम्। क्लीबलिङ्गम्। किल प्रेरणे, क्रीडे-क। कर्मण्यण्। पा० ३।२।१। किल+असु क्षेपणे−अण्। किलं वर्णम् अस्यति क्षिपति विकृतं करोतीति तत् किलासम्। वर्णदूषकम् सिध्मम्। कुष्ठरोगादिकम्। पलितम्। फलेरितजादेश्च पः। उ० ५।३४। इति फल भेदने निष्पत्तौ च−इतच्, फस्य पत्वम्। फलति निष्पन्नं पक्वमिव भवतीति पलितम्। अथवा पल गतौ रक्षणे च−इतच्। शरीरश्वेततारोगः। यत्। यत् किञ्चित् ॥