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Atharvaveda / 4 / 12 / 3

सं ते॑ म॒ज्जा म॒ज्ज्ञा भ॑वतु॒ समु॑ ते॒ परु॑षा॒ परुः॑। सं ते॑ मां॒सस्य॒ विस्र॑स्तं॒ समस्थ्यपि॑ रोहतु ॥ 3॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 12 | Paryay : | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : ऋभुः | देवता : वनस्पतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : अपने दोष मिटाने का उपदेश।

पदपाठ : सम् । ते॒ । म॒ज्जा । म॒ज्ज्ञा । भ॒व॒तु॒ । सम् । ऊं॒ इति॑ । ते॒ । परु॑षा । परु॑: । सम् । ते॒ । मां॒सस्य॑ । विऽस्र॑स्तम् । सम् । अस्थि॑ । अपि॑ । रो॒ह॒तु॒ ॥१२.३॥

पदार्थ : [हे विद्वान्] (ते) तेरे (मज्जा) हाड़ की मींग (मज्ज्ञा) हाड़ की मींग से (संभवतु) मिल जावे (उ) और (ते परुः) तेरा जोड़ (परुषा) जोड़ से (सम्=संभवतु) मिल जावे। (ते) तेरे (मांसस्य) मांस का (विस्रस्तम्) हटा हुआ अंश (सम्=सं रोहतु) जुड़ जावे, और (अस्थि) हाड़ (अपि) भी (सं रोहतु) जुड़ कर ठीक हो जावे ॥३॥"

भावार्थ : मनुष्य अपने चंचल मन को ज्ञानप्राप्ति में ऐसा जोड़ दे, जैसे वैद्य विचलित अवयवों को जोड़ देता है ॥३॥

टिप्पणी :३−(ते) तव (मज्जा) अ० १।११।४। अस्थिमध्यस्थस्नेहः (मज्जा) अस्थिस्नेहेन (सं भवतु) संयुक्तो भवतु (उ) अपि (परुषा) पर्वणा (परुः) पर्व (मांसस्य) मन ज्ञाने धृतौ च-स प्रत्ययः। रक्तजधातुविशेषस्य (विस्रस्तम्) वि+स्रन्सु पतने-क्त। विचलितो भागः (अस्थि) शरीरस्थधातुविशेषः (अपि) (सं रोहतु) संहितं भवतु ॥