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Atharvaveda / 4 / 12 / 4

म॒ज्जा म॒ज्ज्ञा सं धी॑यतां॒ चर्म॑णा॒ चर्म॑ रोहतु। असृ॑क्ते॒ अस्थि॑ रोहतु मां॒सं मां॒सेन॑ रोहतु ॥ 4॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 12 | Paryay : | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : ऋभुः | देवता : वनस्पतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : अपने दोष मिटाने का उपदेश।

पदपाठ : म॒ज्जा । म॒ज्ज्ञा । सम् । धी॒य॒ता॒म् । चर्म॑णा । चर्म॑ । रो॒ह॒तु॒ । असृ॑क् । ते॒ । अस्थि॑ । रो॒ह॒तु॒ । मां॒सम् । मां॒सेन॑ । रो॒ह॒तु॒ ॥१२.४॥

पदार्थ : (मज्जा) हाड़ की मींग (मज्ज्ञा) हाड़ की मींग से (सं धीयताम्) मिल जावे, (चर्म) चाम (चर्मणा) चाम के साथ (रोहतु) जम जावे। (ते) तेरा (असृक्) रुधिर और (अस्थि) हाड़ (रोहतु) जमे, और (मांसम्) मांस (मांसेन) मांस के साथ (रोहतु) जमे ॥४॥"

भावार्थ : मनुष्य अपने चंचल मन को ज्ञानप्राप्ति में ऐसा जोड़ दे, जैसे वैद्य विचलित अवयवों को जोड़ देता है ॥४॥

टिप्पणी :४−(मज्जा) अस्थिस्नेहः (मज्ज्ञा) अस्थिस्नेहेन (सं धीयताम्) संहितः संयुक्तो भवतु (चर्मणा) सर्वधातुभ्यो मनिन्। उ० ४।१४५। इति चर गतौ-मनिन्। शरीरावरणम् (चर्म) त्वचा (रोहतु) प्ररूढं भवतु संयुज्यताम् (असृक्) असु क्षेपे-ऋजि प्रत्ययः। अस्यते। क्षिप्यते इतस्ततो नाडीभिः। रुधिरः। अन्यत् सुगमम् ॥