Atharvaveda / 5 / 5 / 6
हिर॑ण्यवर्णे॒ सुभ॑गे॒ सूर्य॑वर्णे॒ वपु॑ष्टमे। रु॒तं ग॑च्छासि निष्कृते॒ निष्कृ॑ति॒र्नाम॒ वा अ॑सि ॥ 6॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 5 | Sukta : 5 | Paryay : | Mantra No : 6
In English:
Seer : atharvaa | Devta : laakShaasuuktam | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : hiraNyavarNe subhage suuryavarNe vapuShTame. ruta.m gachChaasi niShkRRite niShkRRitirnaama vaa asi . 6.
Component Words : hiraNya.avarNe . su.abhage . suurya.avarNe . vapuH.atame . rutam . gachChaasi . niH.akRRite . niH.akRRitiH . naama . vai . asi .5.6.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : लाक्षासूक्तम् | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदपाठ : हिर॑ण्यऽवर्णे । सुऽभ॑गे । सूर्य॑ऽवर्णे । वपु॑:ऽतमे । रु॒तम् । ग॒च्छा॒सि॒ । नि॒:ऽकृ॒ते॒ । नि:ऽकृ॑ति: । नाम॑ । वै । अ॒सि॒ ॥५.६॥
पदार्थ : (हिरण्यवर्णे) हे सुवर्ण के रूपवाली ! (सुभगे) हे बड़े ऐश्वर्यवाली ! (सूर्यवर्णे) हे सूर्यसमान वर्णवाली ! (वपुष्टमे) हे अतिशय उत्तम रूपवाली ! (निष्कृते) हे उद्धारशक्ति ! (रुतम्) हमारे दुःख में (गच्छासि) तू पहुँच। (निष्कृतिः) उद्धारशक्ति (नाम वै) अवश्य ही (असि) है ॥६॥"
भावार्थ : मनुष्य परमेश्वर के उपकार विचारके निर्धनता, रोग आदि क्लेशों को प्रयत्नपूर्वक हटावें ॥६॥
टिप्पणी :६−(हिरण्यवर्णे) हे सुवर्णरूपे (सुभगे) शोभनैश्वर्ययुक्ते (सूर्यवर्णे) आदित्यवर्णे (वपुष्टमे) वपुः=रूपम्−निघ० ३।७। मतुपो लोपः। वपुष्मत्तमे। अतिशयप्रशस्तरूपे (रुतम्) रुङ् गतिहिंसयोः−क्त। दुःखम् (गच्छासि) लेट्। प्राप्नुयाः (निष्कृते) म० ४। रोगस्य बहिष्करणशक्ते (निष्कृतिः) निर्मुक्तिः। उद्धारशक्तिः (नाम) अवश्यम् (वै) एव (असि) ॥