Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 5 / 26 / 5

छन्दां॑सि य॒ज्ञे म॑रुतः॒ स्वाहा॑ मा॒तेव॑ पु॒त्रं पि॑पृते॒ह यु॒क्ताः ॥ 5॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 5 | Sukta : 26 | Paryay : | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : मरुद्गणः | छन्द : द्विपदार्च्युष्णिक् | स्वर :

विषय : समाज की वृद्धि करने का उपदेश।

पदपाठ : छन्दां॑सि । य॒ज्ञे । म॒रु॒त॒: । स्वाहा॑ । मा॒ताऽइ॑व । पु॒त्रम् । पि॒पृ॒त॒ । इ॒ह । यु॒क्ता: ॥२६.५॥

पदार्थ : (युक्ताः) हे योग्य (मरुतः) शूर पुरुषो ! (स्वाहा) सुन्दर वाणी से (इह) यहाँ (यज्ञे) परस्पर मिलाप में (छन्दांसि) आनन्द बढ़ानेवाले कर्मों को [इस प्रकार] (पिपृत) पालो, (माता इव) जैसे माता (पुत्रम्) कुलशोधक सन्तान को ॥५॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :५−(छन्दांसि) अ० ४।३४।१। आह्लादकानि कर्माणि (यज्ञे) संगमे (मरुतः) अ० १।२–०।१। हे विजयिनो देवाः (स्वाहा) (माता) अ० १।˜२।१। माननीया जननी (इव) यथा (पुत्रम्) कुलशोधकं सन्तानम् (पिपृत) पॄ पालनपूरणयोः। पालयत (इह) अस्मिन् संसारे (युक्ताः) योग्याः। मिलिताः ॥