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Atharvaveda / 6 / 131 / 1

नि शी॑र्ष॒तो नि प॑त्त॒त आ॒ध्यो॒ नि ति॑रामि ते। देवाः॒ प्र हि॑णुत स्म॒रम॒सौ मामनु॑ शोचतु ॥ 1॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 6 | Sukta : 131 | Paryay : | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : स्मरः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : परस्पर पालन का उपदेश।

पदपाठ : ‍नि । शी॒र्ष॒त: । नि ।प॒त्त॒त: । आ॒ऽध्य᳡: । नि । ति॒रा॒मि॒। ते॒ । देवा॑: । प्र । हि॒णु॒त॒ । स्म॒रम् । अ॒सौ । माम् । अनु॑ । शो॒च॒तु॒ ॥१३१.१॥

पदार्थ : [हे मनुष्य !] (ते) तेरे लिये (शीर्षतः) अपने मस्तक [सामर्थ्य] से (नि) निश्चय करके, (पत्ततः) अपने पद [के सामर्थ्य] से (नि) नियम करके (आध्यः) यथावत् ध्यान धर्मों को (नि) लगातार (तिरामि) मैं पार करूँ। (देवाः) हे विद्वानों ! (स्मरम्) स्मरण सामर्थ्य को (प्र) अच्छे प्रकार (हिणुत) बढ़ाओ, (असौ) वह [स्मरण सामर्थ्य] (माम् अनु) मुझ में व्यापकर (शोचतु) शुद्ध रहे ॥१॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१−(नि) निश्चयेन (शीर्षतः) शिरःसामर्थ्यात् (नि) नियमेन (पत्ततः) एकस्तकारश्छान्दसः। पत्तः। पादसामर्थ्यात् (आध्यः) आध्यायते आधीः। ध्यायतेः क्विप् सम्प्रसारणं च। वा० पा० ३।२।१७८। आङ्+ध्यै चिन्तायाम्−क्विप्, शसि रूपम्। सम्यग्ध्यानधर्मान् (नि) निरन्तरम् (तिरामि) मुदादित्वादिकारः। पारं गमयामि। समापयामि। अन्यत् पूर्ववत्−सू० १३० म० १ ॥