Atharvaveda / 8 / 10 / 2 / 8
अ॒पो वा॑मदे॒व्येन॑ य॒ज्ञं य॑ज्ञाय॒ज्ञिये॑न ॥ 8॥
Veda : Atharvaveda | Paryay : 2 | Sukta : 10 | Paryay : 2 | Mantra No : 8
In English:
Seer : atharvaachaaryaH | Devta : viraaT | Metre : aasurii gaayatrii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : apo vaamadevyena yaj~na.m yaj~naayaj~niyena . 8.
Component Words : apaH . vaama.adevyena . yaj~nam . yaj~naayaj~niyena . 11.8.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वाचार्यः | देवता : विराट् | छन्द : आसुरी गायत्री | स्वर :
विषय : ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदपाठ : अ॒प: । वा॒म॒ऽदे॒व्येन॑ । य॒ज्ञम् । य॒ज्ञा॒य॒ज्ञिये॑न । ११.८॥
पदार्थ : (देवाः) गतिमान् लोकों ने (एव) अवश्य (ओषधीः) अन्न आदि ओषधियों को (रथन्तरेण) रथन्तर [रमणीय पदार्थों से पार लगानेवाले जगत्] द्वारा, (व्यचः) विस्तार को (बृहता) बृहत् [बड़े आकाश] द्वारा, (अपः) प्रजाओं को (वामदेव्येन) वामदेव [मनोहर परमात्मा] से जताये गये [भूतपञ्चक] द्वारा और (यज्ञम्) यज्ञ [संयोग-वियोग आदि] की (यज्ञायज्ञियेन) सब यज्ञों के हितकारी [वेदज्ञान] द्वारा (अदुह्रन्) दुहा है ॥७, ८॥"
भावार्थ : टिप्पणी :७, ८−(ओषधीः) अन्नादिपदार्थान् (एव) अवश्यम् (रथन्तरेण) म० ६। जगद्द्वारा (देवाः) गतिशीला लोकाः (अदुह्रन्) अदुहन्। प्रपूरितवन्तः (व्यचः) निरु० ८।१०। विस्तारम् (बृहता) म० ६। प्रवृद्धेनाकाशेन (अपः) प्रजाः−दयानन्दभाष्ये, यजु० ६।२७। उत्पन्नान् पदार्थान् (वामदेव्येन) म० ६। मनोहरेण परमात्मना विज्ञापितेन भूतपञ्चकेन (यज्ञम्) संयोगवियोगव्यवहारम् (यज्ञायज्ञियेन) म० ६। सर्वयज्ञेभ्यो हितेन वेदज्ञानेन ॥