Atharvaveda / 8 / 10 / 2 / 9
ओष॑धीरे॒वास्मै॑ रथन्त॒रं दु॑हे॒ व्यचो॑ बृ॒हत् ॥ 9॥
Veda : Atharvaveda | Paryay : 2 | Sukta : 10 | Paryay : 2 | Mantra No : 9
In English:
Seer : atharvaachaaryaH | Devta : viraaT | Metre : saamnyanuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : oShadhiirevaasmai rathantara.m duhe vyacho bRRihat . 9.
Component Words : oShadhiiH . eva . asmai . rathama.ataram . duhe . vyachaH . bRRihat .11.9.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वाचार्यः | देवता : विराट् | छन्द : साम्न्यनुष्टुप् | स्वर :
विषय : ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदपाठ : ओष॑धी: । ए॒व । अ॒स्मै॒ । र॒थ॒मऽत॒रम् । दु॒हे॒ । व्यच॑: । बृ॒हत् ॥११.९॥
पदार्थ : (रथन्तरम्) रथन्तर [रमणीय पदार्थों से पार लगानेवाला, जगत्] (एव) ही (व्यचः) विस्तृत (बृहत्) बृहत् [बड़े आकाश] से (ओषधीः) अन्न आदि ओषधियों को, और (अपः) सब प्रजाओं और (वामदेव्यम्) वामदेव [मनोहर परमात्मा] से जताये गये [पञ्चभूत] से (यज्ञम्) पूजनीय व्यवहार और (यज्ञायज्ञियम्) सब यज्ञों के हितकारी [वेदज्ञान] को (अस्मै) उस [पुरुष] के लिये (दुहे) दोहता है, (यः एवम् वेद) जो ऐसा जानता है ॥९, १०॥"
भावार्थ : टिप्पणी :९, १०−(अस्मै) ब्रह्मज्ञानिने (दुहे) द्विकर्मकः। दुग्धे। प्रपूरयति (व्यचः) विस्तृतम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥