Atharvaveda / 9 / 5 / 14
अ॑मो॒तं वासो॑ दद्या॒द्धिर॑ण्य॒मपि॒ दक्षि॑णाम्। तथा॑ लो॒कान्त्समा॑प्नोति॒ ये दि॒व्या ये च॒ पार्थि॑वाः ॥ 14॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 9 | Sukta : 5 | Paryay : | Mantra No : 14
In English:
Seer : bhRRiguH | Devta : ajaH pa~nchaudanaH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : amota.m vaaso dadyaaddhiraNyamapi dakShiNaam. tathaa lokaantsamaapnoti ye divyaa ye cha paarthivaaH . 14.
Component Words : amaa.autam . vaasaH . dadyaat.N . hiraNyam . api . dakShiNaam . tathaa . lokaan . sam . aapnoti . ye . divyaaH . ye . cha . paarthivaaH .5.14.
In Hindi:
ऋषि : भृगुः | देवता : अजः पञ्चौदनः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।
पदपाठ : अ॒मा॒ऽउ॒तम् । वास॑: । द॒द्या॒त् । हिर॑ण्यम् । अपि॑ । दक्षि॑णाम् । तथा॑ । लो॒कान् । सम् । आ॒प्नो॒ति॒ । ये । दि॒व्या: । ये । च॒ । पार्थि॑वा: ॥५.१४॥
पदार्थ : वह (अमोतम्) ज्ञान के साथ बुना हुआ (वासः) वस्त्र और (हिरण्यम्) सुवर्ण (अपि) भी (दक्षिणाम्) दक्षिणा (दद्यात्) देवे। (तथा) उससे वह [उन] (लोकान्) लोकों को (सम्) पूरा-पूरा (आप्नोति) पाता है (ये) जो (दिव्याः) अन्तरिक्ष के (च) और (ये) जो (पार्थिवाः) पृथिवी के हैं ॥१४॥"
भावार्थ : टिप्पणी :१४−(अमोतम्) पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण। पा० ३।३।११८। अम गतौ+घ प्रत्ययः, टाप्-वेञ् तन्तुसन्ताने-क्त, सम्प्रसारणं च। ज्ञानेन स्यूतम् (वासः) वस्त्रम् (दद्यात्) (हिरण्यम्) सुवर्णम् (अपि) (दक्षिणाम्) दानम् (तथा) तेन प्रकारेण (लोकान्) प्रतिष्ठास्थानानि (सम्) सम्यक् (आप्नोति) प्राप्नोति (ये) लोकाः (दिव्याः) दिवि अन्तरिक्षे भवाः (ये) (च) (पार्थिवाः) पृथिव्यां भवाः ॥