Atharvaveda / 9 / 6 / 1 / 4
यद॑भि॒वद॑ति दी॒क्षामुपै॑ति॒ यदु॑द॒कं याच॑त्य॒पः प्र ण॑यति ॥ 4॥
Veda : Atharvaveda | Paryay : 1 | Sukta : 6 | Paryay : 7 | Mantra No : 4
In English:
Seer : brahmaa | Devta : atithiH, vidyaa | Metre : aarchyanuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : yadabhivadati diikShaamupaiti yadudaka.m yaachatyapaH pra Nayati . 4.
Component Words : yat . abhi.avadati . diikShaam . upa . eti . yat . udakam . yaachati . apaH . pra . nayati .6.4.
In Hindi:
ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अतिथिः, विद्या | छन्द : आर्च्यनुष्टुप् | स्वर :
विषय : संन्यासी और गृहस्थ के धर्म का उपदेश।
पदपाठ : यत् । अ॒भि॒ऽवद॑ति । दी॒क्षाम् । उप॑ । ए॒ति॒ । यत् । उ॒द॒कम् । याच॑ति । अ॒प: । प्र । न॒य॒ति॒ ॥६.४॥
पदार्थ : (यत्) जब वह [गृहस्थ] (अभिवदति) अभिवादन करता है, वह (दीक्षाम्) दीक्षा [व्रत का उपदेश] (उप एति) आदरपूर्वक पाता है, (यत्) जब (उदकम्) जल को वह [गृहस्थ] (याचति) विनय करके देता है, वह [गृहस्थ] (अपः) जल (प्र णयति) [प्रणीता पात्र में] सन्मुख लाता है ॥४॥"
भावार्थ : टिप्पणी :४−(यत्) यदा (अभिवदति) संवदति प्रणमति वा (दीक्षाम्) अ० ८।५।१५। व्रतोपदेशम् (उपैति) आदरेण प्राप्नोति (यत्) यदा (याचति) याचृ आत्मने दानार्थं प्रेरणे, ग्रहणार्थं प्रेरणेऽपि-शब्दकल्पद्रुमः। विनयेन ददाति। (अपः) जलानि (प्र णयति) प्रणीतापात्रेण समर्पयति गृहस्थः ॥