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Atharvaveda / 9 / 6 / 1 / 5

या ए॒व य॒ज्ञ आपः॑ प्रणी॒यन्ते॒ ता ए॒व ताः ॥ 5॥

Veda : Atharvaveda | Paryay : 1 | Sukta : 6 | Paryay : 7 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अतिथिः, विद्या | छन्द : आसुरी गायत्री | स्वर :

विषय : संन्यासी और गृहस्थ के धर्म का उपदेश।

पदपाठ : या: । ए॒व । य॒ज्ञे । आप॑: । प्र॒ऽनी॒यन्ते॑ । ता: । ए॒व । ता: ॥६.५॥

पदार्थ : (याः) जो (एव) ही (आपः) जल (यज्ञे) यज्ञ में (प्रणीयन्ते) आदर से लाये जाते हैं, (ताः) वे (एव) ही (ताः) वे [अतिथि के लिये उपकारी होते हैं] ॥५॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :५−(याः) (एव) (यज्ञे) सत्करणीये व्यवहारे (आपः) जलानि (प्रणीयन्ते) आदरेण दीयन्ते (ताः) जलानि (एव) (ताः) उपकारिण्य इत्यर्थः ॥