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Atharvaveda / 9 / 6 / 2 / 2

यदाह॒ भूय॒ उद्ध॒रेति॑ प्रा॒णमे॒व तेन॒ वर्षी॑यांसं कुरुते ॥ 2॥

Veda : Atharvaveda | Paryay : 2 | Sukta : 6 | Paryay : 8 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अतिथिः, विद्या | छन्द : साम्नी त्रिष्टुप् | स्वर :

विषय : अतिथि के सत्कार का उपदेश।

पदपाठ : यत् । आह॑ । भूय॑: । उत् । ह॒र॒ । इति॑ । प्रा॒णम् । ए॒व । तेन॑ । वर्षी॑यांसम् । कु॒रु॒ते॒ ॥७.२॥

पदार्थ : (यत्) जब वह [अतिथि] (आह) कहे “−[इस ब्रह्म को] (भूयः) और अधिक (उत् हर इति) उत्तमता से ग्रहण कर”−(तेन) उस से वह [गृहस्थ] (प्राणम्) अपने प्राण [जीवन] को (एव) निश्चय करके (वर्षीयांसम्) अधिक बड़ा (कुरुते) बनाता है ॥२॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :२−(यत्) यदा (आह) ब्रूते (भूयः) अधिकतरम् (उद्धर) उत्तमतया गृहाण (इति) (प्राणम्) जीवनम् (एव) निश्चयेन (तेन) कारणेन (वर्षीयांसम्) वृद्धतरम् ॥