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Atharvaveda / 9 / 6 / 2 / 5

स्रु॒चा हस्ते॑न प्रा॒णे यूपे॑ स्रुक्का॒रेण॑ वषट्का॒रेण॑ ॥ 5॥

Veda : Atharvaveda | Paryay : 2 | Sukta : 6 | Paryay : 8 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अतिथिः, विद्या | छन्द : साम्नी बृहती | स्वर :

विषय : अतिथि के सत्कार का उपदेश।

पदपाठ : स्रु॒चा । हस्ते॑न । प्रा॒णे । यूपे॑ । स्रु॒क्ऽका॒रेण॑ । व॒ष॒ट्ऽका॒रेण॑ ॥७.५॥

पदार्थ : (अतिथिः) अतिथि [संन्यासी] (स्रुचा) स्रुचा [चमचा रूप] (हस्तेन) हाथ से (यूपे) जयस्तम्भरूप (प्राणे) प्राण पर (स्रुक्कारेण) स्रुचा की क्रिया से और (वषट्कारेण) आहुति की क्रिया से [जैसे हो वैसे] (आत्मन्) परमात्मा में (तेषाम्) उन (आसन्नानाम्) समीप रक्खी हुई [हवनद्रव्यों] की (जुहोति) [मानो] आहुतियाँ देता है ॥४, ५॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :४, ५−(तेषाम्) हविषाम्-म० ३ (आसन्नानाम्) समीपस्थानाम् (अतिथिः) अभ्यागतः। संन्यासी (आत्मन्) परमात्मनि (जुहोति) आहुतीः करोति (स्रुचा) यज्ञपात्रभेदेन यथा (हस्तेन) (प्राणे) जीवने (यूपे) कुयुभ्यां च। उ० ३।२७। यु मिश्रणामिश्रणयोः-प प्रत्ययः कित् दीर्घश्च। यज्ञस्तम्भे जयस्तम्भे (स्रुक्कारेण) करोतेर्घञ्। स्रुचाक्रियया (वषट्कारेण) अ० १।११।१। आहुतिक्रियया ॥