Atharvaveda / 9 / 6 / 2 / 6
ए॒ते वै प्रि॒याश्चाप्रि॑याश्च॒र्त्विजः॑ स्व॒र्गं लो॒कं ग॑मयन्ति॒ यदति॑थयः ॥ 6॥
Veda : Atharvaveda | Paryay : 2 | Sukta : 6 | Paryay : 8 | Mantra No : 6
In English:
Seer : brahmaa | Devta : atithiH, vidyaa | Metre : aarchyanuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : ete vai priyaashchaapriyaashchartvijaH svarga.m loka.m gamayanti yadatithayaH . 6.
Component Words : ete . vai . priyaaH . cha . apriyaaH . cha . RRitvijaH . svaH.agam . lokam . gamayanti . yat . atithayaH .7.6.
In Hindi:
ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अतिथिः, विद्या | छन्द : आर्च्यनुष्टुप् | स्वर :
विषय : अतिथि के सत्कार का उपदेश।
पदपाठ : ए॒ते । वै । प्रि॒या: । च॒ । अप्रि॑या: । च॒ । ऋ॒त्विज॑: । स्व॒:ऽगम् । लो॒कम् । ग॒म॒य॒न्ति॒ । यत् । अति॑थय: ॥७.६॥
पदार्थ : (यत्) क्योंकि (एते) यह (एव) ही (प्रियाः) प्रिय माने गये (च) और (अप्रियाः) अप्रिय माने गये (च) भी (ऋत्विजः) सब ऋतुओं में यज्ञ [देवपूजा, संगतिकरण और दान] करनेवाले (अतिथयः) अतिथि [संन्यासी] जन (स्वर्गम्) सुख देनेवाले (लोकम्) दर्शनीय लोक में [मनुष्य को] (गमयन्ति) पहुँचाते हैं ॥६॥"
भावार्थ : टिप्पणी :६−(एते) (वै) निश्चयेन (प्रियाः) प्रीताः (च) (अप्रियाः) अप्रीताः (ऋत्विजः) अ० ६।२।१। सर्वर्तुयाजकाः (स्वर्गम्) सुखप्रापकम् (लोकम्) दर्शनीयं पदम् (गमयन्ति) प्रापयन्ति (यत्) यस्मात् कारणात् (अतिथयः) संन्यासिनः ॥