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Atharvaveda / 10 / 5 / 48

यद॑ग्ने अ॒द्य मि॑थु॒ना शपा॒तो॒ यद्वा॒चस्तृ॒ष्टं ज॒नय॑न्त रे॒भाः। म॒न्योर्मन॑सः शर॒व्या॒ जाय॑ते॒ या तया॑ विध्य॒ हृद॑ये यातु॒धाना॑न् ॥ 48॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 10 | Sukta : 5 | Paryay : | Mantra No : 48

In Hindi:

ऋषि : सिन्धुद्वीपः | देवता : प्रजापतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : शत्रुओं के नाश का उपदेश।

पदपाठ : यत् । अ॒ग्ने॒ । अ॒द्य । मि॒थु॒ना । शपा॑त: । यत् । वा॒च: । तृ॒ष्टम् । ज॒नय॑न्त । रे॒भा: । म॒न्यो: । मन॑स: । श॒र॒व्या᳡ । जाय॑ते । या । तया॑ । वि॒ध्य॒ । हृद॑ये । या॒तु॒ऽधाना॑न् ॥५.४८॥

पदार्थ : (अग्ने) हे अग्नि [समान तेजस्वी राजन् !] (यत्) जो (अद्य) आज (मिथुना) दो हिंसक मनुष्य [सत्पुरुषों से] (शपातः) कुवचन बोलते हैं, और (यत्) जो (रेभाः) शब्द करनेवाले [शत्रु लोग] (वाचः) वाणी की (तृष्टम्) कठोरता (जनयन्त) उत्पन्न करते हैं, (मन्योः) क्रोध से (मनसः) मन की (या) जो (शरच्याः) बाणों की झड़ी (जायते) उत्पन्न होती है, (तया) उस से (यातुधानान्) दुःखदायिओं को (हृदये) हृदय में (विध्य) तू बेध ले ॥४८॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :४८−अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ० ८।३।१२ ॥