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Atharvaveda / 10 / 5 / 49

परा॑ शृणीहि॒ तप॑सा यातु॒धाना॒न्परा॑ग्ने॒ रक्षो॒ हर॑सा शृणीहि। परा॑र्चिषा॒ मूर॑देवाञ्छृणीहि॒ परा॑सु॒तृपः॒ शोशु॑चतः शृणीहि ॥ 49॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 10 | Sukta : 5 | Paryay : | Mantra No : 49

In Hindi:

ऋषि : सिन्धुद्वीपः | देवता : प्रजापतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : शत्रुओं के नाश का उपदेश।

पदपाठ : परा॑ । शृ॒णी॒हि॒ । तप॑सा । या॒तु॒ऽधाना॑न् । परा॑ । अ॒ग्ने॒ । रक्ष॑: । हर॑सा । शृ॒णी॒हि॒ । परा॑ । अ॒र्चिषा॑ । मूर॑ऽदेवान् । शृ॒णी॒हि॒ । परा॑ । अ॒सु॒ऽतृप॑: । शोशु॑चत: । शृ॒णी॒हि॒ ॥५.४९॥

पदार्थ : (अग्ने) हे अग्नि [समान तेजस्वी राजन् !] (तपसा) अपने तप [ऐश्वर्य वा प्रताप] से (यातुधानान्) दुःखदायिओं को (परा शृणीहि) कुचल डाल, (रक्षः) राक्षसों [दुराचारियों वा रोगों] को (हरसा) अपने बल से (परा शृणीहि) मिटा दे। (अर्चिषा) अपने तेज से (मूरदेवान्) मूढ़ [निर्बुद्धि] व्यवहारवालों को (परा शृणीहि) नाश कर दे, (शोशुचतः) अत्यन्त दमकते हुए, (असुतृपः) [दूसरों को] प्राणों से तृप्त होनेवालों को (परा शृणीहि) चूर-चूर कर दे ॥४९॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :४९−अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ० ८।३।१३ ॥