Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 10 / 6 / 11

यमब॑ध्ना॒द्बृह॒स्पति॒र्वाता॑य म॒णिमा॒शवे॑। सो अ॑स्मै वा॒जिन॒मिद्दु॑हे॒ भूयो॑भूयः॒ श्वःश्व॒स्तेन॒ त्वं द्वि॑ष॒तो ज॑हि ॥ 11॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 10 | Sukta : 6 | Paryay : | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : बृहस्पतिः | देवता : फालमणिः, वनस्पतिः | छन्द : पथ्यापङ्क्तिः | स्वर :

विषय : सब कामनाओं की सिद्धि का उपदेश।

पदपाठ : यम् । अब॑ध्नात् । बृह॒स्पति॑: । वाता॑य । म॒णिम् । आ॒शवे॑ । स: । अ॒स्मै॒ । वा॒जिन॑म् । दु॒हे॒ । भूय॑:ऽभूय:। श्व:ऽश्व॑: । तेन॑ । त्वम् । द्वि॒ष॒त: । ज॒हि॒ ॥६.११॥

पदार्थ : (यम्) जिस (मणिम्) मणि [प्रशंसनीय वैदिक नियम] को (बृहस्पतिः) बृहस्पति [बड़े ब्रह्माण्डों के स्वामी परमेश्वर] ने (वाताय) गमनशील (आशवे) भोक्ता [प्राणी] के लिये (अबध्नात्) बाँधा है। (सः) वह [वैदिक नियम] (अस्मै) इस [प्राणी] के लिये (वाजिनम्) बल (भूयोभूयः) बहुत-बहुत (श्वः श्वः) कल्प के पीछे कल्प [नित्य आगामी काल में] (दुहे) पूरा करता है, (तेन) उस [वैदिक नियम] से (त्वम्) तू (द्विषतः) वैरियों को (जहि) मार ॥११॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :११−(वाताय) अ० १।११।६। वा गतौ-तन्। गमनशीलाय। उद्योगिने (आशवे) कृवापा०। उ० १।१। अश भोजने-उण्। भोक्त्रे प्राणिने (वाजिनम्) महेरिनण् च। उ० २।५६। वज गतौ-इनण्। बलम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥