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Atharvaveda / 10 / 9 / 17

यस्ते॑ प्ला॒शिर्यो व॑नि॒ष्ठुर्यौ कु॒क्षी यच्च॒ चर्म॑ ते। आ॒मिक्षां॑ दुह्रतां दा॒त्रे क्षी॒रं स॒र्पिरथो॒ मधु॑ ॥ 17॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 10 | Sukta : 9 | Paryay : | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : शतौदना (गौः) | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : वेदवाणी की महिमा का उपदेश।

पदपाठ : य: । ते॒ । प्ला॒शि: । य: । व॒नि॒ष्ठु: । यौ । कु॒क्षी इति॑ । यत् । च॒ । चर्म॑ । ते॒ । अ॒मिक्षा॑म् । दु॒ह्र॒ता॒म् । दा॒त्रे । क्षी॒रम् । स॒र्पि:। अथो॒ इति॑ । मधु॑ ॥९.१७॥

पदार्थ : (यः) जो (ते) तेरी (प्लाशिः) प्लाशि [अन्न की आधार आँत], (यः) जो (वनिष्ठुः) [अन्न, रक्त आदि बाँटनेवाली आँत], (यौ) जो (कुक्षी) दो कोखें (च) और (यत्) जो (ते) तेरा (चर्म) चर्म है, वे सब (आमिक्षाम्) आमिक्षा [पकाये उष्ण दूध में दही मिलाने से उत्पन्न वस्तु], (क्षीरम्) दूध, (सर्पिः) घी (अथो) और भी (मधु) मधु ज्ञान [ब्रह्मविद्या] (दात्रे) दाता को (दुह्रताम्) भरपूर करें ॥१७॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१७−(प्लाशिः) अ० ९।७।१२। अन्नाधार आन्त्रविशेषः (वनिष्ठुः) अ० ९।७।१२। अन्नरक्तादिसंभाजकं स्थूलान्त्रम् (कुक्षी) उदरपार्श्वौ। अन्यत् स्पष्टम् ॥