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Atharvaveda / 10 / 9 / 19

यौ ते॑ बा॒हू ये दो॒षणी॒ यावंसौ॒ या च॑ ते क॒कुत्। आ॒मिक्षां॑ दुह्रतां दा॒त्रे क्षी॒रं स॒र्पिरथो॒ मधु॑ ॥ 19॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 10 | Sukta : 9 | Paryay : | Mantra No : 19

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : शतौदना (गौः) | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : वेदवाणी की महिमा का उपदेश।

पदपाठ : यौ । ते॒ । बा॒हू इति॑ । ये इति॑ । दो॒षणी॒ इति॑ । यौ । अंसौ॑ । या । च॒ । ते॒ । क॒कुत् । अ॒मिक्षा॑म् । दु॒ह्र॒ता॒म् । दा॒त्रे । क्षी॒रम् । स॒र्पि:। अथो॒ इति॑ । मधु॑ ॥९.१९॥

पदार्थ : (यौ) जो (ते) तेरी (बाहू) दो भुजाएँ (ये), जो (दोषणी) दो भुजदण्ड, (यौ) जो (अंसौ) दो कन्धे (च) और (या) जो (ते) तेरा (ककुत्) कूबर [कुब्ब] है। वे सब (आमिक्षाम्) आमिक्षा [पकाये उष्ण दूध में दही मिलाने से उत्पन्न वस्तु], (क्षीरम्) दूध, (सर्पिः) घी (अथो) और भी (मधु) मधु ज्ञान [ब्रह्मविद्या] (दात्रे) दाता को (दुह्रताम्) भरपूर करें ॥१९॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१९−(दोषणी) अ० ९।७।७। भुजदण्डौ (ककुत्) अ० ३।४।२। वृषादिस्कन्धपृष्ठस्थमांसपिण्डः। अन्यत् स्पष्टम् ॥