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Atharvaveda / 10 / 9 / 20

यास्ते॑ ग्री॒वा ये स्क॒न्धा याः पृ॒ष्टीर्याश्च॒ पर्श॑वः। आ॒मिक्षां॑ दुह्रतां दा॒त्रे क्षी॒रं स॒र्पिरथो॒ मधु॑ ॥ 20॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 10 | Sukta : 9 | Paryay : | Mantra No : 20

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : शतौदना (गौः) | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : वेदवाणी की महिमा का उपदेश।

पदपाठ : या: । ते॒ । ग्री॒वा: । ये । स्क॒न्धा: । या: । पृ॒ष्टी: । या: । च॒ । पर्श॑व: । अ॒मिक्षा॑म् । दु॒ह्र॒ता॒म् । दा॒त्रे । क्षी॒रम् । स॒र्पि:। अथो॒ इति॑ । मधु॑ ॥९.२०॥

पदार्थ : (याः) जो (ते) तेरी (ग्रीवाः) गले की नाड़ियाँ, (ये) जो (स्कन्धाः) कन्धे की हड्डियाँ, (याः) जो (पृष्टीः) छोटी पसलियाँ (च) और (याः) जो (पर्शवः) बड़ी पसलियाँ हैं, वे सब (आमिक्षाम्) आमिक्षा [पकाये उष्ण दूध में दही मिलाने से उत्पन्न वस्तु], (क्षीरम्) दूध, (सर्पिः) घी (अथो) और भी (मधु) मधु ज्ञान [ब्रह्मविद्या] (दात्रे) दाता को (दुह्रताम्) भरपूर करें ॥२०॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :२०−(ग्रीवाः) कण्ठस्थनाड्यः (स्कन्धाः) स्कन्धास्थीनि (पृष्टीः) अ० ९।७।६। पार्श्वस्थीनि (पर्शवः) अ० ९।७।६। पार्श्वाधःस्थास्थीनि। अन्यत् स्पष्टम् ॥