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Atharvaveda / 10 / 10 / 14

सं हि वाते॒नाग॑त॒ समु॒ सर्वैः॑ पत॒त्रिभिः॑। व॒शा स॑मु॒द्रे प्रानृ॑त्य॒दृचः॒ सामा॑नि॒ बिभ्र॑ती ॥ 14॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 10 | Sukta : 10 | Paryay : | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : कश्यपः | देवता : वशा | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : ईश्वर शक्ति की महिमा का उपदेश।

पदपाठ : सम् । हि । वाते॑न । अग॑त । सम् । ऊं॒ इति॑ । सर्वै॑: । प॒त॒त्रिऽभि॑: । व॒शा । स॒मु॒द्रे । प्र । अ॒नृ॒त्य॒त् । ऋच॑: । सामा॑नि । बिभ्र॑ती ॥१०.१४॥

पदार्थ : (ऋचः) स्तुतियोग्य [वेदवाणियों] और (सामानि) मोक्षज्ञानों को (बिभ्रती) रखती हुई (वशा) वशा [कामनायोग्य परमेश्वरशक्ति] (हि) ही (वातेन) वायु से (उ) और (सर्वैः) सब (पतत्रिभिः) पक्षियों से (सम् सम् अगत) निरन्तर मिली है, और उसने (समुद्रे) अन्तरिक्ष में (प्र) अच्छे प्रकार (अनृत्यत्) अङ्ग फड़काए हैं ॥१४॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१४−(वातेन) वायुना (सम् सम् अगत) म० १३। निरन्तरं संगतवती (सर्वैः) समस्तैः (पतत्रिभिः) पक्षिभिः (समुद्रे) अन्तरिक्षे (प्र) प्रकर्षेण (अनृत्यत्) अङ्गानि विक्षिप्तवती (ऋचः) स्तुत्या वेदवाणीः (सामानि) अ० ७।५४।१। मोक्षज्ञानानि (बिभ्रती) धारयन्ती। अन्यत् पूर्ववत् ॥