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Atharvaveda / 10 / 10 / 15

सं हि सूर्ये॑णागत॒ समु॒ सर्वे॑ण॒ चक्षु॑षा। व॒शा स॑मु॒द्रमत्य॑ख्यद्भ॒द्रा ज्योतीं॑षि॒ बिभ्र॑ती ॥ 15॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 10 | Sukta : 10 | Paryay : | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : कश्यपः | देवता : वशा | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : ईश्वर शक्ति की महिमा का उपदेश।

पदपाठ : सम् । हि । सूर्ये॑ण । अग॑त । सम् । ऊं॒ इति॑ । सर्वे॑ण । चक्षु॑षा । व॒शा । स॒मु॒द्रम् । अति॑ । अ॒ख्य॒त् । भ॒द्रा । ज्योतीं॑षि । बिभ्र॑ती ॥१०.१५॥

पदार्थ : (भद्रा) उत्तम (ज्योतींषि) ज्योतियों को (बिभ्रती) रखती हुई (वशा) वशा [कामनायोग्य परमेश्वरशक्ति] (हि) ही (सूर्येण) सूर्य के साथ (उ) और (सर्वेण) प्रत्येक (चक्षुषा) दृष्टि के साथ (सम् सम् अगत) निरन्तर मिली है और उसने (समुद्रम्) अन्तरिक्ष को (अति) अत्यन्त करके (अख्यत्) प्रकाशित किया है ॥१५॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१५−(सूर्येण) सूर्यमण्डलेन (चक्षुषा) दर्शनशक्त्या (अति) अत्यन्तम् (अख्यत्) चक्षिङ् व्यक्तायां वाचि दर्शने च। प्रकाशितवती (भद्रा) श्रेष्ठानि (ज्योतींषि) प्रकाशान्। अन्यत् पूर्ववत् ॥