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Atharvaveda / 15 / 17 / 4

तस्य॒व्रात्य॑स्य।यो᳡ऽस्य॑ चतु॒र्थो व्या॒नस्तानि॒ नक्ष॑त्राणि ॥4॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 17 | Paryay : | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : साम्नी उष्णिक् | स्वर :

विषय : व्रात्य के सामर्थ्य का उपदेश।

पदपाठ : तस्य॑ । व्रात्य॑स्य । य: । अ॒स्य॒ । च॒तु॒र्थ: । वि॒ऽआ॒न: । तानि॑ । नक्ष॑त्राणि ॥१७.४॥

पदार्थ : (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) इस [व्रात्य] का (चतुर्थः) चौथा (व्यानः) व्यान [सब शरीर में फैला हुआ वायु] है, (तानि) वे (नक्षत्राणि) चलनेवाले तारागण हैं [अर्थात् वह तारागणों के परस्पर आकर्षण रखने, अपने-अपने मार्ग पर चलने और उछलने-डूबने आदि का ज्ञान बताता है] ॥४॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :४−(नक्षत्राणि)अमिनक्षियजिवधिपतिभ्योऽत्रन्। उ० ३।१०५। णक्ष गतौ-अत्रन्। गतिशीलानां तारागणानांपरस्पराकर्षणादिज्ञानम्। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥