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Atharvaveda / 15 / 17 / 5

तस्य॒व्रात्य॑स्य।यो᳡ऽस्य॑ पञ्च॒मो व्या॒नस्त ऋ॒तवः॑ ॥5॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 17 | Paryay : | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : प्राजापत्या उष्णिक् | स्वर :

विषय : व्रात्य के सामर्थ्य का उपदेश।

पदपाठ : तस्य॑ । व्रात्य॑स्य । य: । अ॒स्य॒ । प॒ञ्च॒म: । वि॒ऽआ॒न: । ते । ऋ॒तव॑: ॥१७.५॥

पदार्थ : (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) इस [व्रात्य] का (पञ्चमः) पाचवाँ (व्यानः) व्यान [सब शरीर में फैला हुआ वायु] है, (ते) वे (ऋतवः)ऋतुएँ हैं [अर्थात् वह वसन्त आदि ऋतुओं के क्रम और कारण आदि का उपदेश करता है]॥५॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :५−(ऋतवः) वसन्तादीनांक्रमकारणादिबोधः अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥