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Atharvaveda / 16 / 9 / 2

तद॒ग्निरा॑ह॒तदु॒ सोम॑ आह पू॒षा मा॑ धात्सुकृ॒तस्य॑ लो॒के ॥2॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 16 | Sukta : 9 | Paryay : | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : यम | देवता : सोम, पूषा | छन्द : आर्ची उष्णिक् | स्वर :

विषय : सुख की प्राप्ति का उपदेश।

पदपाठ : तत् । अ॒ग्नि: । आ॒ह॒ । तत् । ऊं॒ इति॑ । सोम॑: । आ॒ह॒ । पू॒षा । मा॒ । धा॒त् । सु॒ऽकृ॒तस्य॑ । लो॒के ॥९.२॥

पदार्थ : (तत्) यह (अग्निः)ज्ञानस्वरूप परमेश्वर (आह) कहता है, (तत् उ) यही (सोमः) सर्वोत्पादक परमात्मा (आह) कहता है, (पूषा) पोषण करनेवाला जगदीश्वर (मा) मुझे (सुकृतस्य) पुण्य कर्मके (लोके) लोक [समाज] में (धात्) रक्खे ॥२॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :२−(तत्) इदम् (अग्निः)ज्ञानस्वरूपपरमेश्वरः (आह) ब्रवीति। उपदिशति (तत्) (उ) एव (सोमः) सर्वोत्पादकःपरमात्मा (आह) (पूषा) सर्वपोषकजगदीश्वरः (मा) माम् (धात्) दध्यात् (सुकृतस्य)पुण्यकर्मणः (लोके) समाजे ॥