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Atharvaveda / 20 / 48 / 5

अ॒न्तश्च॑रति रोच॒ना अ॒स्य प्रा॒णाद॑पान॒तः। व्य॑ख्यन्महि॒षः स्व᳡: ॥ 5॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 48 | Paryay : | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : सार्पराज्ञी | देवता : गौः, सूर्यः | छन्द : गायत्री | स्वर :

विषय : सूर्य वा भूमि के गुणों का उपदेश।

पदपाठ : अ॒न्त: । च॒र॒ति॒ । रो॒च॒ना । अ॒स्य । प्रा॒णात् । अ॒पा॒न॒त: ॥ वि । अ॒ख्य॒त् । म॒हि॒ष: । स्व॑: ॥४८.५॥

पदार्थ : (प्राणात्) भीतर के श्वास के पीछे (अपानतः) बाहर को श्वास निकालते हुए (अस्य) इस [सूर्य] की (रोचना) रोचक ज्योति (अन्तः) [जगत् के] भीतर (चरति) चलती है, और वह (महिषः) बड़ा सूर्य (स्वः) आकाश को (वि) विविध प्रकार (अख्यत्) प्रकाशित करता है ॥॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :४-६−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अ० ६।३१।१-३ ॥