Atharvaveda / 20 / 48 / 6
त्रिं॒शद्धामा॒ वि रा॑जति॒ वाक्प॑त॒ङ्गो अ॑शिश्रियत्। प्रति॒ वस्तो॒रह॒र्द्युभिः॑ ॥ 6॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 48 | Paryay : | Mantra No : 6
In English:
Seer : saarparaaj~nii | Devta : gauH, suuryaH | Metre : chatuShpadaa shakvarii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : tri.mshaddhaamaa vi raajati vaakpata~Ngo ashishriyat. prati vastorahardyubhiH . 6.
Component Words : tri.mshat . dhaama . vi . raajati . vaak . pata~NgaH . ashishriyat . prati . vastoH . ahaH . dyu.abhiH .48.6.
In Hindi:
ऋषि : सार्पराज्ञी | देवता : गौः, सूर्यः | छन्द : गायत्री | स्वर :
विषय : सूर्य वा भूमि के गुणों का उपदेश।
पदपाठ : त्रिं॒शत् । धाम॑ । वि । रा॒ज॒ति॒ । वाक् । प॒त॒ङ्ग: । अ॒शि॒श्रि॒य॒त् ॥ प्रति॑ । वस्तो॑: । अह॑: । द्युऽभि॑: ॥४८.६॥
पदार्थ : (पतङ्गः) चलनेवाला वा ऐश्वर्यवाला सूर्य (त्रिंशद् धामा) तीस धामों पर [दिन-रात्रि के तीस मुहूर्तों पर] (वस्तोः, अहः) दिन-दिन (द्युभिः) अपनी किरणों और गतियों के साथ (प्रति) प्रत्यक्ष रूप से (वि) विविध प्रकार (राजति) राज करता वा चमकता है, (वाक्) इस वचन ने [उस सूर्य में] (अशिश्रियत्) आश्रय लिया है ॥६॥"
भावार्थ : टिप्पणी :४-६−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अ० ६।३१।१-३ ॥