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Atharvaveda / 20 / 57 / 10

इ॑न्द्र॒ आशा॑भ्य॒स्परि॒ सर्वा॑भ्यो॒ अभ॑यं करत्। जेता॒ शत्रू॒न्विच॑र्षणिः ॥ 10॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 57 | Paryay : | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर :

विषय : १-१० मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।

पदपाठ : इन्द्र॑: । आशा॑भ्य: । परि॑ । सर्वा॑भ्य:। अभ॑यम् । क॒र॒त् ॥ जेता॑ । शत्रू॑न् । विच॑र्षणि: ॥५७.१०॥

पदार्थ : (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाला राजा] (सर्वाभ्यः) सब (आशाभ्यः) आशाओं [गहरी इच्छाओं] के लिये (अभयम्) अभय (परि) सब ओर से (करत्) करे। वह (शत्रून् जेता) शत्रुओं को जीतनेवाला और (विचर्षणिः) विशेष देखनेवाला है ॥१०॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :४-१०- एते मन्त्रा व्याख्याताः-अ० २।२०।१-७ ॥