Atharvaveda / 20 / 57 / 11
क ईं॑ वेद सु॒ते सचा॒ पिब॑न्तं॒ कद्वयो॑ दधे। अ॒यं यः पुरो॑ विभि॒नत्त्योज॑सा मन्दा॒नः शि॒प्र्यन्ध॑सः ॥ 11॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 57 | Paryay : | Mantra No : 11
In English:
Seer : medhyaatithiH | Devta : indraH | Metre : tripadaa saamnyanuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : ka ii.m veda sute sachaa pibanta.m kadvayo dadhe. aya.m yaH puro vibhinattyojasaa mandaanaH shipryandhasaH . 11.
Component Words : kaH . iim . veda . sute . sachaa . pibantam . kat . vayaH . dadhe . ayam . yaH . puraH . vi.abhinatti . ojasaa . mandaanaH . shiprii . andhasaH .57.11.
In Hindi:
ऋषि : मेध्यातिथिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : बृहती | स्वर :
विषय : ११-१३ सेनापति के लक्षणों का उपदेश।
पदपाठ : क: । ई॒म् । वे॒द॒ । सु॒ते । सचा॑ । पिब॑न्तम् । कत् । वय॑: । द॒धे॒ ॥ अ॒यम् । य: । पुर॑: । वि॒ऽभि॒नत्ति॑ । ओज॑सा । म॒न्दा॒न: । शि॒प्री । अन्ध॑स: ॥५७.११॥
पदार्थ : (कः) कौन (सचा) नित्य मेल के साथ (सुते) तत्त्वरस (पिबन्तम्) पीते हुए (ईम्) प्राप्तियोग्य [सेनापति] को (वेद) जानता है ? (कत्) कितना (वयः) जीवनसामर्थ्य [पराक्रम] (दधे) वह रखता है ? (अयम्) यह (यः) जो (शिप्री) दृढ़ जबड़ेवाला, (अन्धसः) अब का (मन्दानः) आनन्द देनेवाला [वीर] (ओजसा) बल से (पुरः) दुर्गों को (विभिनत्ति) तोड़ देता है ॥११॥"
भावार्थ : टिप्पणी :मन्त्र ११-१३ आचुके हैं-अ० २०।३।१-३ ॥ ११-१३ एते मन्त्रा व्याख्याताः-अ० २०।३।१-३ ॥