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Atharvaveda / 20 / 57 / 13

य उ॒ग्रः सन्ननि॑ष्टृतः स्थि॒रो रणा॑य॒ संस्कृ॑तः। यदि॑ स्तो॒तुर्म॒घवा॑ शृ॒णव॒द्धवं॒ नेन्द्रो॑ योष॒त्या ग॑मत् ॥ 13॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 57 | Paryay : | Mantra No : 13

In Hindi:

ऋषि : मेध्यातिथिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : बृहती | स्वर :

विषय : ११-१३ सेनापति के लक्षणों का उपदेश।

पदपाठ : य: । उ॒ग्र: । सन् । अनि॑:ऽस्तृत: । स्थि॒र: । रणा॑य । संस्कृ॑त: ॥ यदि॑ । स्तो॒तु: । म॒घऽवा॑ । शृ॒णव॑त् । हव॑म् । हव॑म् । न । इन्द्र॑: । यो॒ष॒ति॒ । आ । ग॒म॒त् ॥५७.१३॥

पदार्थ : (यः) जो [वीर] (उग्रः) प्रचण्ड, (अनिष्टृतः) कभी न हराया गया, (स्थिरः) दृढ़ (सन्) होकर (रणाय) रण के लिये (संस्कृतः) संस्कार किये हुए है। (यदि) यदि (मघवा) वह महाधनी (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाला सेनापति] (स्तोतुः) स्तुति करनेवाले की (हवम्) पुकार (शृणवत्) सुने, [तो] (न योषति) वह अलग न रहे, [किन्तु] (आ गमत्) आता रहे ॥१३॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :११-१३ एते मन्त्रा व्याख्याताः-अ० २०।३।१-३ ॥