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Atharvaveda / 20 / 57 / 14

व॒यं घ॑ त्वा सु॒ताव॑न्त॒ आपो॒ न वृ॒क्तब॑र्हिषः। प॒वित्र॑स्य प्र॒स्रव॑णेषु वृत्रह॒न्परि॑ स्तो॒तार॑ आसते ॥ 14॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 57 | Paryay : | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : मेध्यातिथिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : बृहती | स्वर :

विषय : मन्त्र १४-१६ परमात्मा की उपासना का उपदेश।

पदपाठ : व॒यम् । घ॒ । त्वा॒ । सु॒तऽव॑न्त: । आप॑: । न । वृ॒क्तऽब॑र्ह‍िष: ॥ प॒वित्र॑स्य । प्र॒ऽस्रव॑णेषु । वृ॒त्र॒ऽह॒न् । परि॑ । स्तो॒तार॑: । आ॒स॒ते॒ ॥५७.१४॥

पदार्थ : (वृत्रहन्) हे शत्रुनाशक ! [परमात्मन्] (सुतवन्तः) तत्त्व के धारण करनेवाले, (वृक्तबर्हिषः) हिंसा त्यागनेवाले [अथवा बुद्धि पानेवाले विद्वान्], (स्तोतारः) स्तुति करनेवाले (वयम्) हम लोग (घ) निश्चय करके (त्वा) तुझको (परि आसते) सेवते हैं, (पवित्रस्य) शुद्ध स्थान के (प्रस्रवणेषु) झरना में (आपः न) जैसे जल [ठहरते हैं] ॥१४॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :मन्त्र १४-१६ आचुके हैं-अ० २०।२।१-३ ॥ १४-१६। एते मन्त्रा व्याख्याताः-अ० २०।३।१-३ ॥