Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 20 / 74 / 3

नि ष्वा॑पया मिथू॒दृशा॑ स॒स्तामबु॑ध्यमाने। आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ ॥ 3॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 74 | Paryay : | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : शुनःशेपः | देवता : इन्द्रः | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर :

विषय : राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।

पदपाठ : नि । स्वा॒प॒य॒ । मि॒थु॒ऽदृशा॑ । स॒स्ताम् । अबु॑ध्यमाने॒ । इति॑ । आ । तु । न॒: । इ॒न्द्र॒ । शं॒स॒य॒ । गोषु॑ । अश्वे॑षु । शु॒भ्रिषु॑ । स॒हस्रे॑षु । तु॒वि॒ऽम॒घ॒ ॥७४.३॥

पदार्थ : [हे राजन्] (मिथुदृशा) दोनों हिंसा दिखानेवाले [शरीर और मन] को (नि स्वापय) सुला दे, (अबुध्यमाने) बिना जगे हुए वे दोनों (सस्ताम्) सो जावें। (तुविमघ) हे महाधनी (इन्द्र) इन्द्र ! [बड़े प्रतापी राजन्] (तु) निश्चय करके (नः) हमको (सहस्रेषु) सहस्रों (शुभ्रिषु) शुभ गुणवाले (गोषु) विद्वानों और (अश्वेषु) कामों में व्यापक (बलवानों में (आ) सब ओर से (शंसय) बड़ाईवाला कर ॥३॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :३−(निष्वापय) नितरां सुप्तं कुरु (मिथुदृशा) पॄभिदिव्यधि०। उ० १।२३। मिथृ मेधाहिंसनयोः-कु+दृशेः-क्विप्। सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। विभक्तेराकारः। द्वे हिंसादर्शके शरीरमनसी (सस्ताम्) वस स्वप्ने। शयाताम् (अबुध्यमाने) अजागरिते। निद्रां प्राप्ते। अन्यद् गतम् ॥