Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 20 / 94 / 10

गोभि॑ष्टरे॒माम॑तिं दु॒रेवां॒ यवे॑न॒ क्षुधं॑ पुरुहूत॒ विश्वा॑म्। व॒यं राज॑भिः प्रथ॒मा धना॑न्य॒स्माके॑न वृ॒जने॑ना जयेम ॥ 10॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 94 | Paryay : | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : कृष्णः | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :

विषय : राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

पदपाठ : गीभि॑: । त॒रे॒म॒ । अम॑तिम् । दु॒:ऽएवा॑म् । यवे॑न । क्षुध॑म् । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । विश्वा॑म् ॥ व॒यम् । राज॑ऽभि: । प्र॒थ॒मा: । धना॑नि । अ॒स्माके॑न । वृ॒जने॑न । ज॒ये॒म॒ ॥९४.१०॥

पदार्थ : (पुरुहूत) हे बहुतों से बुलाये गये ! [राजन्] (गोभिः) विद्याओं से (दुरेवाम्) दुर्गतिवाली (अमतिम्) कुमति [वा कङ्गाली] को और (यवेन) अन्न से (विश्वाम्) सब (क्षुधम्) भूख को (तरेम) हम हटावें। (वयम्) हम (राजभिः) राजाओं के साथ (प्रथमाः) प्रथम श्रेणीवाले होकर (धनानि) अनेक धनों को (अस्माकेन) अपने (वृजनेन) बल से (जयेम) जीतें ॥१०॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :मन्त्र १०, ११ आचुके हैं-अ० २०।१७।१०, ११। और कुछ भेद से-२०।८९।१०, ११ ॥ १०, ११−मन्त्रौ व्याख्यातौ-अ० २०।१७।१०, ११ ॥