Atharvaveda / 20 / 109 / 2
ता अ॑स्य पृशना॒युवः॒ सोमं॑ श्रीणन्ति॒ पृश्न॑यः। प्रि॒या इन्द्र॑स्य धे॒नवो॒ वज्रं॑ हिन्वन्ति॒ साय॑कं॒ वस्वी॒रनु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥ 2॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 109 | Paryay : | Mantra No : 2
In English:
Seer : gotamaH | Devta : indraH | Metre : triShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : taa asya pRRishanaayuvaH soma.m shriiNanti pRRishnayaH. priyaa indrasya dhenavo vajra.m hinvanti saayaka.m vasviiranu svaraajyam . 2.
Component Words : taaH . as.Nya . pRRishana.ayuvaH . somam . shriiNanti . pRRishnayaH . priyaaH . indrasya . dhenavaH . vajram . hinvanti . saayakam .109.2.
In Hindi:
ऋषि : गोतमः | देवता : इन्द्रः | छन्द : पथ्यापङ्क्तिः | स्वर :
विषय : सभापति और सभासदों के लक्षणों का उपदेश।
पदपाठ : ता: । अ॒स्य॒ । पृ॒श॒न॒ऽयुव॑: । सोम॑म् । श्री॒ण॒न्ति॒ । पृश्न॑य: ॥ प्रि॒या: । इन्द्र॑स्य । धे॒नव॑: । वज्र॑म् । हि॒न्व॒न्ति॒ । साय॑कम् ॥१०९.२॥
पदार्थ : (अस्य) इस (इन्द्रस्य) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले सभापति] की (पृशनायुवः) स्पर्श चाहती हुई और (पृश्नयः) प्रश्न करती हुई (ताः) वे [प्रजाएँ] (सोमम्) सोम [तत्त्व रस] को (श्रीणन्ति) परिपक्व करती हैं। (प्रियाः) प्रीति करती हुई, (धेनवः) गौओं के समान तृप्त करनेवाली (वस्वीः) बसनेवाली [प्रजाएँ] (स्वराज्यम् अनु) स्वराज्य [अपने राज्य] के पीछे (वज्रम्) वज्र और (सायकम्) बाण को (हिन्वन्ति) बढ़ाती हैं [छोड़ती हैं] ॥२॥"
भावार्थ : टिप्पणी :२−(ताः) (अस्य) (पृशनायुवः) सलोपः। स्पर्शनकामाः। (सोमम्) तत्त्वरसम् (श्रीणन्ति) पचन्ति (पृश्नयः) घृणिपृश्निपार्ष्णि०। उ० ४।२। प्रछ जिज्ञासायाम्-नि। जिज्ञासमानाः (प्रियाः) प्रीतिकारिण्यः (इन्द्रस्य) परमैश्वर्यवतः सभाध्यक्षस्य (धेनवः) गावो यथा तर्पयित्र्यः (वज्रम्) आयुधम् (हिन्वन्ति) प्रेरयन्ति (सायकम्) शरम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥