Atharvaveda / 20 / 109 / 3
ता अ॑स्य॒ नम॑सा॒ सहः॑ सप॒र्यन्ति॒ प्रचे॑तसः। व्र॒तान्य॑स्य सश्चिरे पु॒रूणि॑ पू॒र्वचि॑त्तये॒ वस्वी॒रनु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥ 3॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 109 | Paryay : | Mantra No : 3
In English:
Seer : gotamaH | Devta : indraH | Metre : triShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : taa asya namasaa sahaH saparyanti prachetasaH. vrataanyasya sashchire puruuNi puurvachittaye vasviiranu svaraajyam . 3.
Component Words : taaH . asya . namasaa . saha . saparyanti . pra.achetasaH . vrataani . asya . sashchire . puruuNi . puurva.achittaye . vasviiH . anu . sva.araajyam .109.3.
In Hindi:
ऋषि : गोतमः | देवता : इन्द्रः | छन्द : पथ्यापङ्क्तिः | स्वर :
विषय : सभापति और सभासदों के लक्षणों का उपदेश।
पदपाठ : ता: । अ॒स्य॒ । नम॑सा । सह॑ । स॒प॒र्यन्ति॑ । प्रऽचे॑तस: ॥ व्र॒तानि॑ । अ॒स्य॒ । स॒श्चि॒रे॒ । पु॒रूणि॑ । पू॒र्वऽचि॑त्तये । वस्वी॑: । अनु॑ । स्व॒ऽराज्य॑म् ॥१०९.३॥
पदार्थ : (प्रचेतसः) उत्तम ज्ञानवाली (ताः) वे [प्रजाएँ] (तमसा) आदर के साथ (अस्य) उस [सभापति] के (सहः) बल का (सपर्यन्ति) सेवन करती हैं। (वस्वीः) बसनेवाली [प्रजाएँ] (स्वराज्यम् अनु) स्वराज्य [अपने राज्य] के पीछे (पूर्वचित्तये) पूर्वजों का ज्ञान पाने के लिये (अस्य) इस [सभापति] के (पुरूणि) बहुत से (व्रतानि) नियमों को (सश्चिरे) प्राप्त होती हैं ॥३॥"
भावार्थ : टिप्पणी :३−(ताः) प्रजाः (अस्य) सभापतेः (नमसा) सत्कारेण (सहः) बलम् (सपर्यन्ति) सेवन्ते (प्रचेतसः) प्रकृष्टज्ञानवत्यः (व्रतानि) नियमान् (अस्य) (सश्चिरे) सश्च गतौ। गच्छन्ति। प्राप्नुवन्ति (पुरूणि) बहूनि (पूर्वचित्तये) चिती संज्ञाने-क्तिन्। पूर्वेषां ज्ञानप्राप्तये। अन्यत् पूर्ववत् ॥