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Atharvaveda / 20 / 142 / 6

यन्नू॒नं धी॒भिर॑श्विना पि॒तुर्योना॑ नि॒षीद॑थः। यद्वा॑ सु॒म्नेभि॑रुक्थ्या ॥6॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 142 | Paryay : | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : शशकर्णः | देवता : अश्विनौ | छन्द : गायत्री | स्वर :

विषय : दिन और राति के उत्तम प्रयोग का उपदेश।

पदपाठ : यत् । नू॒नम् । धी॒भि: । अ॒श्वि॒ना॒ । पि॒तु: । योना॑ । नि॒ऽसीद॑थ: ॥ यत् । वा॒ । सु॒म्नेभि॑: । उ॒क्थ्या॒ ॥१४२.६॥

पदार्थ : (यत्) क्योंकि (नूनम्) अवश्य, (उक्थ्या) हे बड़ाई योग्य (अश्विना) दोनों अश्वी [व्यापक दिन-राति] (धीभिः) कर्मों के साथ, (वा) और (यत्) क्योंकि (सुम्नेभिः) अनेक सुखों के साथ (पितुः) पालन करनेवाले पुरुष के (योना) घर में (निषीदथः) दोनों बैठते हो ॥६॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :६−(यत्) यतः (नूनम्) अवश्यम् (धीभिः) कर्मभिः-निघ० २।१। (अश्विना) हे व्यापकौ। अहोरात्रौ (पितुः) पालनकर्तुः पुरुषस्य (योना) योनौ। गृहे (निषीदथः) उपविशथः। निवसथः (यत्) यतः (वा) समुच्चये (सुम्नेभिः) सुम्नैः। अनेकसुखैः (उक्थ्या) हे उक्थ्यौ। प्रशस्यौ ॥