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Rigveda / 1 / 113 / 2

रुश॑द्वत्सा॒ रुश॑ती श्वे॒त्यागा॒दारै॑गु कृ॒ष्णा सद॑नान्यस्याः। स॒मा॒नब॑न्धू अ॒मृते॑ अनू॒ची द्यावा॒ वर्णं॑ चरत आमिना॒ने ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 113 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : उषाः द्वितीयस्यार्द्धर्चस्य रात्रिरपि | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब रात्रि और प्रभातवेला के व्यवहार को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : रुश॑त्ऽवत्सा। रुश॑ती। श्वे॒त्या। आ। अ॒गा॒त्। अरै॑क्। ऊँ॒ इति॑। कृ॒ष्णा। सद॑नानि। अ॒स्याः॒। स॒मा॒नब॑न्धू॒ इति॑ स॒मा॒नऽब॑न्धू। अ॒मृते॒ इति॑। अ॒नू॒ची इति॑। द्यावा॑। वर्ण॑म्। च॒र॒तः॒। आ॒मि॒ना॒ने इत्या॑ऽमि॒ना॒ने ॥ १.११३.२

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो यह (रुषद्वत्सा) प्रकाशित सूर्यरूप बछड़े की कामना करनेहारी वा (रुशती) लाल लालसी (श्वेत्या) शुक्लवर्णयुक्त अर्थात् गुलाबी रङ्ग की प्रभात वेला (आ, अगात्) प्राप्त होती है (अस्याः, उ) इस अद्भुत उषा के (सदनानि) स्थानों को प्राप्त हुई (कृष्णा) काले वर्णवाली रात (आरैक्) अच्छे प्रकार अलग-अलग वर्त्तती है, वे दोनों (अमृते) प्रवाहरूप से नित्य (आमिनाने) परस्पर एक दूसरे को फेंकती हुई सी (अनूची) वर्त्तमान (द्यावा) अपने-अपने प्रकाश से प्रकाशमान (समानबन्धू) दो सहोदर वा दो मित्रों के तुल्य (वर्णम्) अपने-अपने रूप को (चरतः) प्राप्त होती हैं, उन दोनों का युक्ति से सेवन किया करो ॥ २ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जिस स्थान में रात्री वसती है, उसी स्थान में कालान्तर में उषा भी वसती है। इन दोनों से उत्पन्न हुआ सूर्य्य जानों दोनों माताओं से उत्पन्न हुए लड़के के समान है और ये दोनों सदा बन्धु के समान जाने-आनेवाली उषा और रात्रि हैं, ऐसा तुम लोग जानो ॥ २ ॥