Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 113 / 3

स॒मा॒नो अध्वा॒ स्वस्रो॑रन॒न्तस्तम॒न्यान्या॑ चरतो दे॒वशि॑ष्टे। न मे॑थेते॒ न त॑स्थतुः सु॒मेके॒ नक्तो॒षासा॒ सम॑नसा॒ विरू॑पे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 113 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : उषाः द्वितीयस्यार्द्धर्चस्य रात्रिरपि | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : स॒मा॒नः। अध्वा॑। स्वस्रोः॑। अ॒न॒न्तः। तम्। अ॒न्याऽअ॑न्या। च॒र॒तः॒। दे॒वशि॑ष्टे॒ इति॑ दे॒वऽशि॑ष्टे। न। मे॒थे॒ते॒ इति॑। न। त॒स्थ॒तुः॒। सु॒मेके॒ इति॑ सु॒ऽमेके॑। नक्तो॒षासा॑। सऽम॑नसा। विरू॑पे॒ इति॒ विऽरू॑पे ॥ १.११३.३

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जिन (स्वस्रोः) बहिनियों के समान वर्त्ताव रखनेवाली रात्री और प्रभातवेलाओं का (अनन्तः) अर्थात् सीमारहित आकाश (समानः) तुल्य (अध्वा) मार्ग है जो (देवशिष्टे) परमेश्वर के शासन अर्थात् यथावत् नियम को प्राप्त (विरूपे) विरुद्धरूप (समनसा) तथा समान चित्तवाले मित्रों के तुल्य वर्त्तमान (सुमेके) और नियम में छोड़ी हुई (नक्तोषसा) रात्रि और प्रभात वेला (तम्) उस अपने नियम को (अन्यान्या) अलग-अलग (चरतः) प्राप्त होतीं और वे कदाचित् (न) नहीं (मेथेते) नष्ट होतीं और (न, तस्थतुः) न ठहरती हैं, उनको तुम लोग यथावत् जानो ॥ ३ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विरुद्ध स्वरूपवाले मित्र लोग इस निःसीम अनन्त आकाश में न्यायाधीश के नियम के साथ ही नित्य वर्त्तते हैं, वैसे रात्रि और दिन परमेश्वर के नियम से नियत होकर वर्त्तते हैं ॥ ३ ॥