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Rigveda / 1 / 145 / 3

तमिद्ग॑च्छन्ति जु॒ह्व१॒॑स्तमर्व॑ती॒र्विश्वा॒न्येक॑: शृणव॒द्वचां॑सि मे। पु॒रु॒प्रै॒षस्ततु॑रिर्यज्ञ॒साध॒नोऽच्छि॑द्रोति॒: शिशु॒राद॑त्त॒ सं रभ॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 145 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : तम्। इत्। ग॒च्छ॒न्ति॒। जु॒ह्वः॑। तम्। अर्व॑तीः। विश्वा॑नि। एकः॑। शृ॒ण॒व॒त्। वचां॑सि। मे॒। पु॒रु॒ऽप्रै॒षः। ततु॑रिः। य॒ज्ञ॒ऽसाध॑नः। अच्छि॑द्रऽऊतिः। शिशुः॑। आ। अ॒द॒त्त॒। सम्। रभः॑ ॥ १.१४५.३

पदार्थ : हे विद्वान् ! आप (एकः) अकेले (मे) मेरे (विश्वानि) समस्त (वक्षांसि) वचनों को (शृणवत्) सुनें जो (रभः) बड़ा महात्मा (पुरुप्रैषः) जिसको बहुत सज्जनों ने प्रेरणा दी हो (ततुरिः) जो दुःख से सभों को तारनेवाला (यज्ञसाधनः) विद्वानों के सत्कार जिसके साधन अर्थात् जिसकी प्राप्ति करानेवाले (अच्छिद्रोतिः) जिससे नहीं खण्डित हुई रक्षणादि क्रिया (शिशुः) और जो अविद्यादि दोषों को छिन्न-भिन्न करे, सबके उपकार करने को अच्छा यत्न (समादत्त) भली-भाँति ग्रहण करे (तम्) उसको (अर्वतीः) बुद्धिमती कन्या (गच्छन्ति) प्राप्त होती (तमित्) और उसीको (जुह्वः) विद्या विज्ञान की ग्रहण करनेवाली कन्या प्राप्त होती हैं ॥ ३ ॥

भावार्थ : मनुष्यों ने जो जाना और जो-जो पढ़ा उस-उस की परीक्षा जैसे अपने आप पढ़ानेवाले विद्वान् को देवें वैसे कन्या भी अपनी पढ़ानेवाली को अपने पढ़े हुए की परीक्षा देवें ऐसे करने के विना सत्याऽसत्य का सम्यक् निर्णय होने को योग्य नहीं है ॥ ३ ॥