Rigveda / 1 / 145 / 4
उ॒प॒स्थायं॑ चरति॒ यत्स॒मार॑त स॒द्यो जा॒तस्त॑त्सार॒ युज्ये॑भिः। अ॒भि श्वा॒न्तं मृ॑शते ना॒न्द्ये॑ मु॒दे यदीं॒ गच्छ॑न्त्युश॒तीर॑पिष्ठि॒तम् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 145 | Mantra No : 4
In English:
Seer : diirghatamaa auchathyaH | Devta : agniH | Metre : bhuriktriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : upasthaaya.m charati yatsamaarata sadyo jaatastatsaara yujyebhiH. abhi shvaanta.m mRRishate naandye mude yadii.m gachChantyushatiirapiShThitam .
Component Words : upa.asthaayam. charati. yat. sam.aaarata. sadyaH. jaataH. tatsaara. yujyebhiH. abhi. shvaantam. mRRishate. naandye. mude. yat. iim. gachChanti. ushatiiH. api.asthitam . 1.145.4
In Hindi:
ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदपाठ : उ॒प॒ऽस्थाय॑म्। च॒र॒ति॒। यत्। स॒म्ऽआर॑त। स॒द्यः। जा॒तः। त॒त्सा॒र॒। युज्ये॑भिः। अ॒भि। श्वा॒न्तम्। मृ॒श॒ते॒। ना॒न्द्ये॑। मु॒दे। यत्। ई॒म्। गच्छ॑न्ति। उ॒श॒तीः। अ॒पि॒ऽस्थि॒तम् ॥ १.१४५.४
पदार्थ : हे जिज्ञासु जनो ! (यत्) जो (युज्येभिः) युक्त करने योग्य पदार्थों के साथ (सद्यः) शीघ्र (जातः) प्रसिद्ध हुआ (उपस्थायम्) क्षण क्षण उपस्थान करने को (चरित) जाता है वा (तत्सार) कुटिलपन से जावे वा (श्वान्तम्) परिपक्व पूरे ज्ञान को (अभिमृशते) सब ओर से विचारता है वा बुद्धिमान् जन (यम्) जिस (नान्द्ये) अति आनन्द और (मुदे) सामान्य हर्ष होने के लिये (अपिस्थितम्) स्थिर हुए को और (उशतीः) कामना करती हुई पण्डिताओं को (ईम्) सब ओर से (गच्छन्ति) प्राप्त होते उसको तुम (समारत) अच्छे प्रकार प्राप्त होओ ॥ ४ ॥
भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो बालक और जो कन्या शीघ्र पूर्ण विद्यायुक्त होते हैं और कुटिलतादि दोषों को छोड़ शान्ति आदि गुणों को प्राप्त होकर सबको विद्या तथा सुख होने के लिये बार-बार प्रयत्न करते हैं, वे जगत् को आनन्द देनेवाले होते हैं ॥ ४ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ।
पदपाठ : उ॒प॒ऽस्थाय॑म्। च॒र॒ति॒। यत्। स॒म्ऽआर॑त। स॒द्यः। जा॒तः। त॒त्सा॒र॒। युज्ये॑भिः। अ॒भि। श्वा॒न्तम्। मृ॒श॒ते॒। ना॒न्द्ये॑। मु॒दे। यत्। ई॒म्। गच्छ॑न्ति। उ॒श॒तीः। अ॒पि॒ऽस्थि॒तम् ॥ १.१४५.४
पदार्थ : (उपस्थायम्) अभिक्षणमुपस्थातुम् (चरति) गच्छति (यत्) यः (समारत) सम्यक् प्राप्नुत (सद्यः) शीघ्रम् (जातः) प्रसिद्धः (तत्सार) तत्सरेत् (युज्येभिः) योजितुं योग्यैः सह (अभि) (श्वान्तम्) श्रान्तं परिपक्वज्ञानम्। अत्र वर्णव्यत्ययेन रेफस्य स्थाने वः। (मृशते) (नान्द्ये) आनन्दाय (मुदे) मोदनाय (यत्) यम् (ईम्) सर्वतः (गच्छन्ति) (उशतीः) कामयमाना विदुषीः (अपिस्थितम्) ॥ ४ ॥
अन्वय : हे जिज्ञासवो जना यद्यो युज्येभिस्सह सद्यो जात उपस्थायं चरति तत्सार श्वान्तमभिमृशते बुद्धिमन्तो यद्यं नान्द्ये मुदेऽपिस्थितमुशतीरीं गच्छन्तिं तं यूयं समारत ॥ ४ ॥
भावार्थ : हे मनुष्या ये याश्च सद्यः पूर्णविद्या जायन्ते कुटिलतादिदोषान् विहाय शान्त्यादिगुणान् प्राप्य सर्वेषां विद्यासुखाय अभीक्ष्णं प्रयतन्ते ते जगदानन्ददायकाः सन्ति ॥ ४ ॥