Rigveda / 8 / 2 / 7
त्रय॒ इन्द्र॑स्य॒ सोमा॑: सु॒तास॑: सन्तु दे॒वस्य॑ । स्वे क्षये॑ सुत॒पाव्न॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 2 | Mantra No : 7
In English:
Seer : medhaatithiH kaaNvaH priyamedhashchaa~NgirasaH | Devta : indra: | Metre : viraaDaarShiigaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : traya indrasya somaaH sutaasaH santu devasya . sve kShaye sutapaavnaH .
Component Words : trayaH . indrasya . somaaH . sutaasaH . santu . devasya . sve . kShaye . suta.apaavnaH . 8.2.7
In Hindi:
ऋषि : मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराडार्षीगायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : त्रयः॑ । इन्द्र॑स्य । सोमाः॑ । सु॒तासः॑ । स॒न्तु॒ । दे॒वस्य॑ । स्वे । क्षये॑ । सु॒त॒ऽपाव्नः॑ ॥ ८.२.७
पदार्थ : (सुतपाव्नः) संस्कृत पदार्थों का सेवन करनेवाले (देवस्य) दिव्य तेजस्वी (इन्द्रस्य) कर्मयोगी को (स्वे, क्षये) स्वकीययज्ञसदन में (त्रयः, सोमाः) तीन सोम भाग (सुतासः, सन्तु) दान के लिये संस्कृत हों ॥७॥
भावार्थ : इस मन्त्र का तात्पर्य्य यह है कि तेजस्वी कर्मयोगी के लिये पुनः-पुनः अर्चननिमित्त तीन सोम-भागों के संस्कार का विधान है अर्थात् यज्ञ में आये हुए कर्मयोगी को आगमन, मध्य और गमनकाल में सोमादि उत्तमोत्तम पदार्थ अर्पण करे, जिससे वह प्रसन्न होकर विद्यादि सद्गुणों का उपदेश करके जिज्ञासुओं को अनुष्ठानी बनावे ॥७ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराडार्षीगायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : त्रयः॑ । इन्द्र॑स्य । सोमाः॑ । सु॒तासः॑ । स॒न्तु॒ । दे॒वस्य॑ । स्वे । क्षये॑ । सु॒त॒ऽपाव्नः॑ ॥ ८.२.७
भावार्थ :