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Rigveda / 8 / 2 / 17

न घे॑म॒न्यदा प॑पन॒ वज्रि॑न्न॒पसो॒ नवि॑ष्टौ । तवेदु॒ स्तोमं॑ चिकेत ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 2 | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्षीगायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : न । घ॒ । ई॒म् । अ॒न्यत् । आ । प॒प॒न॒ । वज्रि॑न् । अ॒पसः॑ । नवि॑ष्टौ । तव॑ । इत् । ऊँ॒ इति॑ । स्तोम॑म् । चि॒के॒त॒ ॥ ८.२.१७

पदार्थ : (वज्रिन्) हे वज्रशक्तिशालिन् ! (अपसः, नविष्टौ) कर्मों के नूतन यज्ञ में (अन्यत्) अन्य की (आपपन, न घ, ईं) स्तुति नहीं ही करता हूँ (तव, इत्, उ) आप ही के (स्तोमं) स्तोत्र को (चिकेत) जानता हूँ ॥१७॥

भावार्थ : जिज्ञासु की ओर से यह स्तुति की गई है कि हे बड़ी शक्तिवाले कर्मयोगिन् ! नवीन रचनात्मक कर्मरूपी यज्ञ में मैं आप ही की स्तुति करता हूँ । कृपा करके मुझको आप अपने सदुपदेशों से कर्मण्य बनावें, ताकि मैं भी कर्मशील होकर ऐश्वर्य्य प्राप्त करूँ ॥१७ ॥