Rigveda / 8 / 2 / 21
वि॒द्मा ह्य॑स्य वी॒रस्य॑ भूरि॒दाव॑रीं सुम॒तिम् । त्रि॒षु जा॒तस्य॒ मनां॑सि ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 2 | Mantra No : 21
In English:
Seer : medhaatithiH kaaNvaH priyamedhashchaa~NgirasaH | Devta : indra: | Metre : nichRRidaarShiigaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : vidmaa hyasya viirasya bhuuridaavarii.m sumatim . triShu jaatasya manaa.msi .
Component Words : vidma . hi . asya . viirasya . bhuuri.adaavaariim . su.amatim . triShu . jaatasya . manaa.msi . 8.2.21
In Hindi:
ऋषि : मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदार्षीगायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : वि॒द्म । हि । अ॒स्य॒ । वी॒रस्य॑ । भू॒रि॒ऽदावा॑रीम् । सु॒ऽम॒तिम् । त्रि॒षु । जा॒तस्य॑ । मनां॑सि ॥ ८.२.२१
पदार्थ : (अस्य, वीरस्य) इस कर्मयोगी वीर की (भूरिदावरीं) बहुदानशील (सुमतिं) सुमति को (विद्म, हि) हम जानें (त्रिषु) सत्त्वादि तीनों गुणों में (जातस्य) प्रविष्ट होनेवाले वीर के (मनांसि) मन को हम जानें ॥२१॥
भावार्थ : यज्ञ में आये हुए कर्मयोगी की प्रशंसा करते हुए जिज्ञासु जनों का कथन है कि विद्यादि का दान देनेवाले इस बुद्धिमान् के अनुकूल हमलोग आचरण करें, जिसने सत्त्वादि तीनो गुणों को जाना है अर्थात् जो प्राकृतिक पदार्थों को भले प्रकार जानकर नवीन आविष्कारों का करनेवाला है, या यों कहो कि पदार्थविद्या में भले प्रकार निपुण कर्मयोगी से विद्यालाभ कर ऐश्वर्य्यशाली हों ॥२१ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदार्षीगायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : वि॒द्म । हि । अ॒स्य॒ । वी॒रस्य॑ । भू॒रि॒ऽदावा॑रीम् । सु॒ऽम॒तिम् । त्रि॒षु । जा॒तस्य॑ । मनां॑सि ॥ ८.२.२१
भावार्थ :