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Rigveda / 8 / 2 / 22

आ तू षि॑ञ्च॒ कण्व॑मन्तं॒ न घा॑ विद्म शवसा॒नात् । य॒शस्त॑रं श॒तमू॑तेः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 2 | Mantra No : 22

In Hindi:

ऋषि : मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्षीगायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब यज्ञ में आये हुए कर्मयोगी का सत्कार करना कथन करते हैं।

पदपाठ : आ । तु । सि॒ञ्च॒ । कण्व॑ऽमन्तम् । न । घ॒ । वि॒द्म॒ । श॒व॒सा॒नात् । य॒शःऽत॑रम् । श॒तम्ऽऊ॑तेः ॥ ८.२.२२

पदार्थ : हे जिज्ञासु जनो ! (कण्वमन्तं) विद्वानों से युक्त कर्मयोगी की (तु) शीघ्र (आ, सिञ्च) अभिषेकादि से अर्चना करो (शवसानात्) बल के आधार (शतमूतेः) अनेक प्रकार से रक्षा करने में समर्थ कर्मयोगी से (यशस्तरं) यशस्वितर अन्य को (न, घ, विद्म) हम नहीं जानते ॥२२॥

भावार्थ : याज्ञिक लोगों का कथन है कि हे जिज्ञासु जनसमुदाय ! तुम सब मिलकर विद्वानों सहित आये हुए कर्मयोगी का अर्चन तथा विविध प्रकार से सेवा सत्कार करो, जो विद्वान् महात्माओं के लिये अवश्यकर्तव्य है । ये बलवान्, यशस्वी तथा अनेक प्रकार से रक्षा करनेवाले योगीराज प्रसन्न होकर हमें विद्यादान द्वारा कृतार्थ करें, क्योंकि इनके समान यशस्वी, प्रतापी तथा वेदविद्या में निपुण अन्य कोई नहीं है ॥२२ ॥