Rigveda / 8 / 2 / 32
हन्ता॑ वृ॒त्रं दक्षि॑णे॒नेन्द्र॑: पु॒रू पु॑रुहू॒तः । म॒हान्म॒हीभि॒: शची॑भिः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 2 | Mantra No : 32
In English:
Seer : medhaatithiH kaaNvaH priyamedhashchaa~NgirasaH | Devta : indra: | Metre : nichRRidaarShiigaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : hantaa vRRitra.m dakShiNenendraH puruu puruhuutaH . mahaanmahiibhiH shachiibhiH .
Component Words : hanta . vRRitram . dakShiNena . indraH . puru . puru.ahuutaH . mahaan . mahiibhiH . shachiibhiH . 8.2.32
In Hindi:
ऋषि : मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदार्षीगायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : हन्त॑ । वृ॒त्रम् । दक्षि॑णेन । इन्द्रः॑ । पु॒रु । पु॒रु॒ऽहू॒तः । म॒हान् । म॒हीभिः॑ । शची॑भिः ॥ ८.२.३२
पदार्थ : (इन्द्रः) वही परमैश्वर्य्यसम्पन्न कर्मयोगी (वृत्रं) सन्मार्ग के वारयिता को (दक्षिणेन, हन्ता) चातुर्य्ययुक्त कर्मों से हनन करनेवाला (पुरु) अनेक स्थलों में (पुरुहूतः) बहुत मनुष्यों से आहूत (महीभिः) बड़ी (शचीभिः) शक्ति से (महान्) पूज्य हो रहा है ॥३२॥
भावार्थ : वह महान् ऐश्वर्य्यसम्पन्न कर्मयोगी, जो सन्मार्ग से च्युत पुरुषों को दण्ड देनेवाला और श्रेष्ठों की रक्षा करनेवाला है, वह सब स्थानों में पूजा जाता अर्थात् मान को प्राप्त होता है और सब प्रजाजन उसी की आज्ञा में रहकर मनुष्यजन्म के फलचतुष्टय को प्राप्त होते हैं ॥३२ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदार्षीगायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : हन्त॑ । वृ॒त्रम् । दक्षि॑णेन । इन्द्रः॑ । पु॒रु । पु॒रु॒ऽहू॒तः । म॒हान् । म॒हीभिः॑ । शची॑भिः ॥ ८.२.३२
भावार्थ :