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Rigveda / 8 / 2 / 33

यस्मि॒न्विश्वा॑श्चर्ष॒णय॑ उ॒त च्यौ॒त्ना ज्रयां॑सि च । अनु॒ घेन्म॒न्दी म॒घोन॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 2 | Mantra No : 33

In Hindi:

ऋषि : मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्षीगायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब कर्मयोगी को धनवान् प्रजाओं की रक्षा करना कथन करते हैं।

पदपाठ : यस्मि॑न् । विश्वाः॑ । च॒र्ष॒णयः॑ । उ॒त । च्यौ॒त्ना । ज्रयां॑सि । च॒ । अनु॑ । घ॒ । इत् । म॒न्दी । म॒घोनः॑ ॥ ८.२.३३

पदार्थ : (यस्मिन्) जिस कर्मयोगी के आधार पर (विश्वाः, चर्षणयः) सम्पूर्ण प्रजा हैं (उत) और (च्यौत्ना, ज्रयांसि, च) जिसमें दूसरों का अभिभव करनेवाले बल हैं (मघोनः, अनु) वह धनवानों के प्रति (मन्दी, घेत्) आनन्ददाता होता है ॥३३॥

भावार्थ : सबका शासक कर्मयोगी, जो अपने अतुल बल से सब प्रजाओं को वशीभूत रखता है, वह धनवानों को सुरक्षित रखता हुआ उनको आनन्द प्रदान करनेवाला होता है ॥३३ ॥