Rigveda / 8 / 8 / 7
दि॒वश्चि॑द्रोच॒नादध्या नो॑ गन्तं स्वर्विदा । धी॒भिर्व॑त्सप्रचेतसा॒ स्तोमे॑भिर्हवनश्रुता ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 8 | Mantra No : 7
In English:
Seer : sadhva.mshaH kaaNvaH | Devta : ashvinau | Metre : viraaDaarShyanuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : divashchidrochanaadadhyaa no ganta.m svarvidaa . dhiibhirvatsaprachetasaa stomebhirhavanashrutaa .
Component Words : divaH . chit . rochanaat . adhi . aa . naH . gantam . svaH.avidaa . dhiibhiH . vatsa.aprachetasaa . stomebhiH . havana.ashrutaa . 8.8.7
In Hindi:
ऋषि : सध्वंशः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : विराडार्ष्यनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय :
पदपाठ : दि॒वः । चि॒त् । रो॒च॒नात् । अधि॑ । आ । नः॒ । ग॒न्त॒म् । स्वः॒ऽवि॒दा॒ । धी॒भिः । व॒त्स॒ऽप्र॒चे॒त॒सा॒ । स्तोमे॑भिः । ह॒व॒न॒ऽश्रु॒ता॒ ॥ ८.८.७
पदार्थ : (स्वर्विदा) हे द्युलोक की गति जाननेवाले (धीभिः, वत्सप्रचेतसा) अपनी बुद्धि से वत्ससदृश प्रजा के गुप्तरहस्य जाननेवाले (स्तोमेभिः, हवनश्रुता) स्तुतियों द्वारा हवनादि कर्म जाननेवाले ! आप (रोचनात्, दिवः, चित्) रोचमान द्युलोक से (नः) हमारे समीप (अध्यागन्तम्) शीघ्र आएँ ॥७॥
भावार्थ : हे सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष ! आप सब लोक-लोकान्तरों की विद्या, प्रजा के गुप्त रहस्य, यज्ञादि कर्म और वेदविद्या को भले प्रकार जाननेवाले हैं । कृपा करके हमारे यज्ञ में आवें और हम लोगों को उक्त विद्याओं का उपदेश करें ॥७ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : सध्वंशः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : विराडार्ष्यनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
पदपाठ : दि॒वः । चि॒त् । रो॒च॒नात् । अधि॑ । आ । नः॒ । ग॒न्त॒म् । स्वः॒ऽवि॒दा॒ । धी॒भिः । व॒त्स॒ऽप्र॒चे॒त॒सा॒ । स्तोमे॑भिः । ह॒व॒न॒ऽश्रु॒ता॒ ॥ ८.८.७
भावार्थ :