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Rigveda / 8 / 8 / 8

किम॒न्ये पर्या॑सते॒ऽस्मत्स्तोमे॑भिर॒श्विना॑ । पु॒त्रः कण्व॑स्य वा॒मृषि॑र्गी॒र्भिर्व॒त्सो अ॑वीवृधत् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 8 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : सध्वंशः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : विराडार्ष्यनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : किम् । अ॒न्ये । परि॑ । आ॒स॒ते॒ । अ॒स्मत् । स्तोमे॑भिः । अ॒श्विना॑ । पु॒त्रः । कण्व॑स्य । वा॒म् । ऋषिः॑ । गीः॒ऽभिः । व॒त्सः । अ॒वी॒वृ॒ध॒त् ॥ ८.८.८

पदार्थ : (अश्विना) हे व्यापक ! (अस्मत्, अन्ये) हम लोगों से अन्य उपासक (किम्) क्या (स्तोमेभिः) स्तोत्रों द्वारा (पर्यासते) आपका परिचरण करते हैं (कण्वस्य, पुत्रः) यह विद्वान् का पुत्र (ऋषिः) सूक्ष्मद्रष्टा (वत्सः) वत्सतुल्य उपासक (वाम्) आपको (गीर्भिः) यशःप्रकाशक वाणियों द्वारा (अवीवृधत्) बढ़ा रहा है ॥८॥

भावार्थ : हे सर्वत्र विख्यात सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष ! हम लोग आपका सबसे अधिक सत्कार करते और आपके यश का विस्तार करते हैं, इसलिये आप हमारे यज्ञ को प्राप्त होकर वेदविद्या का उपदेश करें ॥८ ॥