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Rigveda / 8 / 10 / 3

त्या न्व१॒॑श्विना॑ हुवे सु॒दंस॑सा गृ॒भे कृ॒ता । ययो॒रस्ति॒ प्र ण॑: स॒ख्यं दे॒वेष्वध्याप्य॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 10 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : प्रगाथः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : आर्चीबृहती | स्वर : मध्यमः

विषय :

पदपाठ : त्या । नु । अ॒श्विना॑ । हु॒वे॒ । सु॒ऽदंस॑सा । गृ॒भे । कृ॒ता । ययोः॑ । अस्ति॑ । प्र । नः॒ । स॒ख्यम् । दे॒वेषु । अधि॑ । आप्य॑म् ॥ ८.१०.३

पदार्थ : (सुदंससा) शोभन कर्मवाले (गृभे) प्रजा का संग्रह करने के लिये (कृता) सम्राट् द्वारा निर्मित (त्या, अश्विना) उन सेनापति तथा सभाध्यक्ष को (हुवे, नु) आह्वान करते हैं, (ययोः, सख्यम्) जिनकी मित्रता (देवेषु) सब देवों के मध्य में (नः) हमको (अधि) अधिक (प्राप्यम्, अस्ति) प्राप्तव्य है ॥३॥

भावार्थ : हे वैदिककर्म करनेवाले सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष ! हम लोग आपके साथ मैत्रीपालन करने के लिये आपका आह्वान करते हैं । आप हमारे यज्ञ में आकर प्रजापालनरूप शुभकर्मों में योग दें, ताकि हमारा यज्ञ सर्वाङ्गपूर्ण हो ॥३ ॥